इसका नाम स्वेदज प्रकृति दिया गया है। इन्हीं रचनाओं में से मेधस प्रणाली का आरंभ होना पाया जाता है। यही क्रम से, समृद्घि की ओर गतिशील रहता है। क्योंकि समृद्घ मेधस सम्पन्न शरीर रचना, इसी धरती में साक्षित हो चुकी है। इसके सामान्य लक्षण रस, मांस, मज्जा, अस्ति, हड्डी, नस, रक्त, चर्म संपन्न शरीर रचना में समृद्घ मेधस का वैभव जीवावस्था में वंशानुषंगीयता के रूप में, प्रमाणित है और मानव संस्कारानुषंगीयता के रूप में प्रमाणित होता है। वंशानुषंगीयता में जीवन, शरीरों के अनुरूप कार्य-कलाप में संलग्न हो जाता है, फलत: वंशानुषंगीय अभिव्यक्ति में जीवन का वैभव सम्बद्घ हो जाता है। दूसरी विधि से शरीर की रचना में भागीदारी के रूप में सम्बद्घ प्राण कोषाएं निष्प्राण होकर पुन: ऋतु और ऋतुप्रभाव (शीत, उष्ण, वर्षामान का प्रभाव) के अनुसार पुन: सप्राणित होकर कार्य करती है। इसमें जितनी भी रचना, विरचनाएं है, इनमें मेधस का शुभारंभ होते हुए भी, समृद्घ न होने का प्रमाण, स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार से ऐसी क्रियाएं, प्राकृतिक रूप में असमृद्घ मेधस की व्याख्या में, स्पष्ट हो चुकी हैं। – म.वि. 16–18

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