की अपेक्षा मानव में ही कल्पना, भास, आभास, प्रतीति के रूप में पाया जाता है। इसके लिए बहुत सारे प्रयास होना भी स्वाभाविक है। सहअस्तित्ववादी विधि से यह स्पष्ट हो गया है कि विकास क्रम में अनेक रचनायें, स्थिति-परिस्थितियाँ दृष्टिगोचर हो चुकी हैं। इसके मूल में परमाणु ही कार्यरत रहना स्पष्ट हो चुका है। ऐसा परिणामरत परमाणु ही गठन तृप्त पद में घटित हो जाता है। इस घटना के लिए स्वाभाविक क्रिया परिणाम विधि ही है।

परिणाम क्रम में परमाणुओं को भूखे और अजीर्ण पदों में समझना सहज हो गया है। अजीर्ण परमाणु अपने गठन में से समाहित कुछ अंशों को बहिर्गत करने के प्रयास में रहते हैं। ऐसे परमाणु विकिरणीय वैभव से सम्पन्न रहते हैं। विकिरणीयता को ऐसा समझा जा सकता है कि परमाणुओं में क्रियाशीलता सदा-सदा बनाए रखता है, क्रियाशीलता के फलन में ध्वनि, ताप, विद्युत अपने आप निष्पन्न होता ही है। व्यापक वस्तु में भीगे रहने के फलस्वरूप ऊर्जा सम्पन्नता, बल सम्पन्नता बनाये रखते हैं। यही बल सम्पन्नता, चुम्बकीय बल के रूप में गण्य होता है। अतएव, विकिरणीय परमाणु अपने गठन में अजीर्णता को व्यक्त किये रहते हैं, क्योंकि अपने गठन से कुछ अंशों को बहिर्गत करने का प्रयास बना ही रहता है। इस क्रम में विकिरणीयता इस प्रकार से उपार्जित हुआ रहता है कि अजीर्ण परमाणु में मध्यांशों की ओर ताप का अन्तर्नियोजन होता है। इसी क्रम में विद्युत भी बना ही रहता है। यही दोनों प्रक्रिया के फलस्वरूप विकिरणीयता प्रगट रहती है।

भूखे परमाणुओं में कुछ और अंशों को अपने में समा लेने की सम्भावना बनी ही रहती है। इसीलिए भूखे परमाणु नाम है। परमाणुओं में अजीर्ण और भूखा होना तृप्त परमाणुओं के अर्थ में ही समझ में आता है (मानव ही उसका अध्ययन करने वाला है)। ऐसा तृप्त परमाणु ही अर्थात् गठन तृप्त परमाणु ही जीवन पद में होना पाया जाता है। फलस्वरूप, गठनपूर्ण परमाणु में बल और शक्ति अक्षय हो जाते हैं। अक्षयता का तात्पर्य ही है कि कितना भी व्यक्त करें, खर्च करें, घटता ही नहीं है। कितना भी आशा, विचार, इच्छा, प्रमाणों को व्यक्त करें, घटता ही नहीं है, और प्रखर होते रहते हैं। इसलिए अक्षय नाम दिया है। ऐसी अक्षयता को हर मानव अपने में परीक्षण पूर्वक पहचान सकता है।

मानव ही अस्तित्व में एक इकाई है जो स्वयं का भी अध्ययन कर सकता है और सम्पूर्ण का भी अध्ययन कर सकता है। इसी महिमावश मानव अपने पद-प्रतिष्ठा के रूप में ज्ञानावस्था में होना स्पष्ट किया जा चुका है। हर नर-नारी ज्ञानावस्था में समान वैभव है। यही परस्पर समानता का सूत्र है। इस सूत्र को भुलावा देना ही भ्रम का द्योतक है।

इस प्रकार जीवन अपने में एक गठनपूर्ण परमाणु के रूप में होना और चैतन्य क्रियाकलाप के रूप में होना तथा मानव शरीर द्वारा मानव परम्परा में प्रमाणित होना सुस्पष्ट है। इस वैभव प्रतिष्ठा को बनाये रखने में हर मानव को आश्वस्त होने, विश्वस्त होने की मूल आवश्यकता के रूप में अध्ययन करने, समझने और इसे प्रमाणित करने के कार्य में प्रवृत्तियाँ प्रवर्तित हैं। इस प्रकार परमाणु में विकास का मंजिल गठनपूर्ण पद ही है।

उक्त विधि से यह सुस्पष्ट हो गया है कि भौतिक क्रिया, रासायनिक क्रिया, जीवन क्रिया के मूल में परमाणु ही है। जीवन परमाणु गठनपूर्ण है और भौतिक, रासायनिक क्रिया में भागीदारी करते हुए परमाणु गठनशील है। गठनशीलता विधि से भार बंधन, अणु बंधन होना पाया जाता है। वहीं जीवन परमाणु भार बंधन, अणु बंधन से मुक्त रहना पाया जाता है। इसका प्रमाण हर मानव में निहित आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रमाणों को भौतिकीय तुला पर आंकलन और संख्याकरण न कर पाना ही है। भौतिकीय तुला एक उपाय है भार को पहचानने का। इस गवाही से यह स्पष्ट है कि

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