(iv) परिवार मूलक अर्थशास्त्र

आवश्यकता के आधार पर हर जागृत मानव परिवार में उत्पादन कार्य सहज है। ऐसे उत्पादन का हर परिवार मानव सदुपयोग सुरक्षा चाहता ही है। हर परिवार मानव समृद्घिपूर्ण विधि से व्यक्त होना चाहता है अथवा समृद्घि सहित व्यक्त होना चाहता है। यही दो आधार हर जागृत मानव में प्रमाणित होता है और अन्य जागृत होने के क्रम में दोनों आधारों को स्वीकारे रहते हैं। इस प्रकार सर्वमानव अर्थ का सदुपयोग, सुरक्षा स्वीकारे ही है। ऐसी ज्वलंत सत्य सामने रहते हुए भी पूर्ववर्ती अर्थशास्त्र विद इस ओर ध्यान नहीं दे पाए। इसका दो ही कारण स्पष्ट हैं। पहला मानव और मानव परंपरा की मौलिकता, उसकी अखंडता, सार्वभौमता और उसके अक्षुण्णता को पहचानना संभव नहीं हुआ था। उसका मूल कारण जीवन का रचना, स्वरूप, कार्य, लक्ष्य और उसका प्रमाणीकरण की विधियों में अनजान रहे। दूसरा यह भी प्रलोभन व्यापार संग्रह और भोगवाद से जुड़ी हुई मानसिकता से ही पूर्ववर्ती अर्थशास्त्रों का प्रणयन हुई। यही वर्गवाद, समुदायवाद का भी कारक रहा। इस प्रकार पूर्ववर्ती आर्थिक विचार, शास्त्र और तंत्रणाएँ समीक्षित हैं, जबकि आवर्तनशील अर्थ-विचार, शास्त्र, तंत्र पूर्णतया परिवार मूलक स्वराज्य स्वरूपत: अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में अंगभूत विधि से होना स्पष्ट है। - अ.श. 153

परिवार में हर सदस्य स्वायत्त होना ही उनके वयस्कता का प्रमाण है। ऐसे प्रमाण सम्पन्न परिवार के रूप में स्थिति परस्परता में ही संबंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन और उभय तृप्ति जिसका नाम विश्वास है, प्रमाणित होती है एवं निरन्तरता बनी रहती है। और परिवार सहज आवश्यकता के आधार पर अपनाया/स्वीकारा गया उत्पादन कार्य में एक-दूसरे के लिये पूरक होते हैं। यह समृद्घि का स्रोत होना पाया जाता है। यह प्रत्येक परिवार में, से, के लिये संभावी है। समृद्घि का अनुभव सामान्य आकांक्षा संबंधी वस्तुओं से होना पाया जाता है। महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुएं समृद्घि के लिये सहायक हैं। - स.श. 132–150

मानव ही सर्वशुभ की अपेक्षा करता है। अर्थशास्त्र का अध्ययन, समाधान, समृद्घि, अभय और सह-अस्तित्व क्रम में है। समृद्घि का धारक-वाहक परिवार होता है। परंपरा में लाभ के बाद लाभ और भोग के बाद भोग का सम्मोहन बढ़ता आया है। इस सम्मोहन को समीक्षित करने योग्य जागृति को सुलभ करना ही इस आवर्तनशील अर्थचिंतन विचार और शास्त्र की महिमा है। आवर्तनशील अर्थव्यवस्था की क्रियाप्रणाली मनुष्य संबंधों में संतुलन के उपरांत ही सार्थक हो पाता है। जहाँ-जहाँ तक संबंध में संतुलन नहीं है वहाँ-वहाँ तक भ्रमवश लाभोन्माद छाया ही रहता है।

मानव परंपरा में अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान शास्त्र, विज्ञान और तकनीकी शास्त्र, ज्ञान और विवेक शास्त्र के मूल में मानसिकता, विचार, इच्छाओं को पहचाना जाता है।

मानसिकता और विचार ही इच्छापूर्वक कल्पनाशीलता कहलाता है और इसी के साथ कर्म स्वतंत्रता कार्य करने लग जाती है। यही अध्ययन, शोध और अनुसंधान का मूल संपदा प्रत्येक मानव में होना पाया जाता है। कोई इसे उपयोग कर पाते हैं कोई नहीं कर पाते। इसी कल्पनाशीलता का समानता ही है सर्वशुभ की स्वीकृति का आधार। सर्वशुभ के संदर्भ में जितने भी प्रकार से शोध, अनुसंधान, अवतरण घटनाक्रम में, परिस्थिति क्रम में, पीढ़ी से पीढ़ी के रूप में दिखने वाली मानव परंपरा में पाये जाने वाले आंकलन चाहे वह राज्य, राष्ट्र, नस्ल, रंग, धर्म, संप्रदाय, भाषा के आधार पर क्यों न हो, इसमें कितनी विविधता क्यों न हो, यह सभी किसी घटना अथवा परिवर्तित घटना जन्य के रूप

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