प्रवर्तन सह-अस्तित्ववादी विचार शैली के आधार पर सार्थक होना पाया गया। फलस्वरूप समझकर सीखने का सिद्धांत अपने आप सार्वभौम हो जाता है। सार्वभौमता का तात्पर्य सर्वमानव में स्वीकार होने से है। अतएव उल्लेखनीय बिन्दु यही है कि हर नर-नारी समझदारी पूर्वक ही परिवार में भागीदारी करता है। फलतः परिवार सार्थकता रूपी समाधान, समृद्धि रूपी उपकार हर समझदार परिवार में स्वस्फूर्त विधि से प्रमाणित होता है। उपकार विद्या ही मुख्य बिन्दु है। धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा का प्रमाण सर्वविदित होने और सर्वसुलभ होने का तथ्य है। धीरता वीरता पूर्वक मानव सम्पूर्ण उपकार कार्य करता है।
उपकार विधि से ही मानव परम्परा सार्थक होती है। मानव परम्परा की सार्थकता का तात्पर्य समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व लक्षित समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी ही है। इसका प्रमाण विधि व्यक्ति सम्पदा के रूप में वैभवित होने और मूल्यांकित होने के रूप में है, ऐसे समझदार मानव परिवार में समाधान, समृद्धि, उपकार वैभवित होने और मूल्यांकित होने, समाज में अर्थात् विश्व परिवार में समाधान, समृद्धि, अभय, सार्थक होने और मूल्यांकित होने, विश्वमानव व्यवस्था सहज फलन समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व प्रमाणित होने और मूल्यांकित होने के रूप में ही हर मानव सम्पूर्ण मानव है। सम्पूर्ण मानव अपनी सार्थकता को अनुभव करते हैं। हर मानव में सार्थकता की अनुभूति जागृति प्रामाणिकता सहित छः ऐश्वर्यों को समाधान समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व के रूप में प्रायोजित नियोजित होने, उसकी निरंतरता के रूप में मूल्यांकित होने से है। इस विधि से हम अपने अवधारणा में धीरता, वीरता, उदारता को परिवार में और परिवार लक्ष्य के रूप में मूल्यांकित कर सकते हैं। विश्व परिवार रूपी समाज में धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा को मूल्यांकित कर सकता है। म.वि. १९९८, १६०-१६३