(iii) विधि सम्मत संपत्ति
प्राकृतिक ऐश्वर्य का मूल्य = शून्य, क्योंकि प्राकृतिक ऐश्वर्य के निर्माण में मानव का श्रम नियोजन सिद्घ नहीं हुआ है। प्रत्येक पीढ़ी अग्रिम पीढ़ी को जिन साधनों को प्रदान करती है वह उसकी अक्षुण्णता चाहती है न कि विनाश। यह सार्वभौम रूप में पायी जाने वाली मनोवैज्ञानिक अपेक्षा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मानव प्रत्येक मानव, समाज प्रत्येक समाज, वर्ग प्रत्येक वर्ग, राष्ट्र प्रत्येक राष्ट्र अथक प्रयास से जितने भी साधनों का निर्माण करते हैं उनमें स्वयं के उपयोग से अतिरिक्त अग्रिम पीढ़ी के लिए सुगम संन्निवेश (साधन सम्पन्न भविष्य) निर्माण करने का मंगलमय आशय एवं संकल्प समाया हुआ है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि जो जिन साधनों को बिना किसी श्रम नियोजन करतलगत किये हैं वे उनके उत्पादक नहीं थे। उसी साक्ष्य से यह सिद्घ होता है कि वे सभी साधन जो बिना श्रम नियोजन के उपलब्ध हुए हैं, यह विधि सम्मत सम्पत्ति नहीं है। व्यवस्था ही विधि है। यही विकास एवं जागृति का क्रम है। विकास क्रम में अपव्यय नहीं है। अपव्यय के अभाव में साधनों के सम्पत्तिकरण की उपयोगिता एवं आवश्यकता सिद्घ नहीं होती है। तात्पर्य, साधनों के सम्पत्तिकरण की आवश्यकता तभी दृष्टव्य है जब मानव उत्पादन से अधिक उपभोग करने के लिए तत्पर हो। उत्पादन से अधिक उपभोग अमानवीयता के अतिरिक्त और कहीं किया जाना संभव नहीं है। अस्तु, अपव्ययता के लिये अत्याशा का होना, अत्याशा के लिये हीनता, दीनता, क्रूरता का होना देखा जाता है।
साधन व स्थान के सम्पत्तिकरण के अभाव में उपयोग-सदुपयोग उसकी वितरण व्यवस्था प्राथमिकत: सुलभ हो जाएगी जिससे प्रत्येक व्यक्ति के लिये साधन व स्थान का अभाव नहीं रहेगा। अपव्यय से रहित जीवन में अधिक स्थान, अधिक साधन स्वयं में पीड़ा दायक सिद्घ है। अधिक साधन अधिक स्थान को संग्रह करने के मूल में भय की पीड़ा एवं अपव्यय के आग्रह का अनिवार्य रूप में रहना पाया जाता है।
श्रम नियोजन, श्रम विनिमय-पद्घति से प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सेवा व वस्तु को दूसरी सेवा व वस्तु में परिवर्तित करने की सुगमता होती है, जिसमें शोषण, वंचना, प्रवंचना एवं स्तेय की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं जो अपराध परम्परा का वृहद् भाग है। ये संभावनाएं जागृति पूर्वक मानवकृत वातावरण, प्रधानत: व्यवस्था पद्घति एवं शिक्षा से ही निर्मित होती है।
उत्पादक या उत्पादन के लिये सहायक कोटि में ही प्रत्येक मानव गण्य है। उत्पादन क्षमताएं सामान्य, विशेष एवं विशिष्ट प्रभेद से गण्य हैं। उत्पादन के आधारभूत तथ्य शिक्षा, साधन, विनिमय एवं संरक्षण है। यही व्यवस्था का स्पष्ट रूप है। उत्पादन की गति को द्रुतगामी बनाने के लिये तारतम्यतापूर्ण सुद्दढ़ व्यवस्था की अनिवार्यता निरंतर है जिससे आवश्यकता से अधिक उत्पादन होना संभव हो जाता है। - अ.द. 58–59