में आंकलित होना पाया जाता है। इसी तथ्य के आधार पर सर्वशुभ का आशय (1) समाधान (2) समृद्घि (3) अभय (4) सह-अस्तित्व सहज प्रमाण परंपरा में है। - अ.श. 20

5.11 परिवार में संतुलन से समाज में संतुलन

हर मानव परिवार समझदार होना ही है, होंगे ही। इसका आधार है कि हर मानव समझदार होना चाहता है। तभी समाज और व्यवस्था के संतुलन को प्रमाणित करना बनता है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयतापूर्ण आचरण सहज हर जागृत मानव अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में संतुलन को पहचान सकते हैं।

अखंड समाज में संतुलन का स्वरूप जागृति पूर्वक, जागृति विधि से समझ में आता है कि सम्पूर्ण परिवार में कार्यरत प्रत्येक मानव, मानवीयता पूर्वक मानव प्रतिष्ठा संपन्न है। मानव प्रतिष्ठा में परस्पर परिवार और परिवार में कार्यरत प्रत्येक इकाई का सम्बंध पहचानने में आता है। यही जागृति है। पुनः इस प्रत्येक मानव मानवीयता पूर्ण प्रतिष्ठा से सहज वैभव है इसे स्वीकारना, पहचानना तदनुसार सम्बंधों को निश्चय करना व्यवस्था और प्रयोजन सूत्र से सूत्रित रहना और इसे प्रयोग करना ही पूरकता विधि है। हर जागृत मानव अपने को पूरकता विधि से ही प्रस्तुत करता है। अतएव अखंड समाज सूत्र मानवत्व के रूप में सार्थक होना हर भ्रमित व्यक्ति को कल्पना में आता है, जागृत व्यक्ति को समझ में आया रहता है।

समझदार व्यक्ति, समझदार व्यक्ति के साथ पूरक होना परिवार में चिन्हित हो जाता है प्रमाणित होता है। फलस्वरूप समाधान समृद्धि हर जागृत परिवार में प्रमाणित होता ही है।

ऐसे परिवार में हर व्यक्ति उपकार अर्थात् उपाय पूर्वक उत्थान (जागृति और विकास के अर्थ में किया गया तन, मन, धन रूपी अर्थ का प्रयोग उपयोग) से है। जागृति पूर्वक अर्थ का सदुपयोग होना प्रयोजनशील होना, प्रमाणित होता है। इसी तथ्यवश समझदार परिवार में भागीदारी करने वाले उपकार कार्य में प्रवृत्त और कार्यरत होते हैं। यह समाधान समृद्धि का वैभव रूपी प्रमाण है। वैभव का तात्पर्य स्वीकारने योग्य प्रयोजन, आचरण, और समझदारी से है। इस प्रकार उपकार करने वाले होने वाले का योग, संगीत अर्थात् सार्थकता के अर्थ में उभय स्वीकृति के रूप में सम्पन्न होना पाया जाता है। इस प्रकार प्रयोजनशील सार्थकवादी उपकार कार्यक्रम शिक्षा संस्कार के रूप में ही सार्थक होना पाया जाता है। हर मानव समझदारी से संपन्न होने के उपरांत ही स्वायत्त सम्पन्न होता गया। ऐसी स्वायत्तता को छः प्रकार से पहचाना गया प्रमाणों के रूप में विदित कराया जा चुका है। ऐसे समझदार मानव की पहचान पहले समझाये गये छः समाधान सहज गति के रूप में होने के आधार पर ही हर आयाम दिशा कोण के परिप्रेक्ष्यों में लिया गया निर्णय समाधानकारी होना स्वाभाविक है। स्वाभाविक का तात्पर्य व्यक्ति जो समझदार हुआ रहता है उनमें समाधानकारी न्यायकारी, प्रयोजनकारी निर्णय बिना दूसरे के सहायता के सम्पन्न होता है।

फलतः उपकारकारी होता है। इस प्रकार समझदार परिवार में भागीदारी करने वाले सभी नर नारी उपकारकारी कार्य में प्रवर्तित होते हैं। उपकार कार्य में तीन स्वरूप को पहचाना गया है वह समझा हुआ को समझाना, किया हुआ को कराना, सीखा हुआ को सिखाना ही है। सीखा-क्रिया के मूल में समझदारी ही सबल, सार्थक प्रवर्तन है। मानव का

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