लाभ की परिकल्पना भ्रमवश, प्रलोभनवश लाभ प्रवृत्तियां, शोषणपूर्वक संग्रह सुविधा के रूप में होना स्पष्ट हो चुकी है। लाभाकांक्षा भ्रमित मनुष्य को अच्छी लगती है, इसका अच्छा होना, संग्रह सुविधा के आधार पर देखा गया। लाभ के साथ संग्रह की अनिवार्यता, दूसरे क्रम में भोग की पिपासा होना पाया जाता है। इन दोनों विधियों से मानव तो बर्बाद होता ही है। बर्बाद होने का तात्पर्य अतृप्ति की तादात का बढ़ना है, क्योंकि संग्रह का तृप्ति बिंदु नहीं है। इसी के साथ साथ संघर्ष और युद्घ एक अनिवार्य स्थिति बनती है। इसकी गवाहियां पूरी हो चुकी हैं। इसी के साथ नैसर्गिकता में तमाम प्रदूषण फैलाना भी साक्षित हो चुका है। इस प्रकार नैसर्गिकता की बर्बादी देखने को मिलती है। इस स्थिति में भी, सुखी व समाधानित होने की अपेक्षा बनी ही रहती है।

उक्त क्रम में समृद्घि के साथ अभय तथा समाधानापेक्षा, प्रत्येक मनुष्य में देखने को मिलती है। प्रत्येक मनुष्य जीवन के रूप में अक्षय बल, अक्षय शक्ति सम्पन्न है। शरीर के रूप में सीमित बल व शक्ति के रूप में है। साथ ही मनुष्य शरीर व जीवन का संयुक्त साकार रूप है। इसी सत्यतावश भौतिक रासायनिक वस्तुएं शरीर की आवश्यकता हैं। उत्पादन क्रम में जीवन शक्तियां शरीर द्वारा नियोजित होती हैं, फलत: शरीर द्वारा आवश्यकता से अधिक उत्पादन होना मानव सहज है। यही उत्पादन सुलभता है। यह विनियम सुलभता व न्याय सुलभता पूर्वक उपयोगिता, सदुपयोगिता व प्रयोजनीयता सहित समृद्घि, समाधान, अभय, सह-अस्तित्व सहज स्वराज्य व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न होता है। प्रत्येक व्यक्ति का उत्पादक होना अथवा उत्पादन कार्य में भागीदार होना, मानव सहज आयाम है। निश्चित उत्पादन और लाभ-हानि मुक्त विनिमय प्रणाली ही उसके संतुलन को स्पष्ट करती है। - म.वि. 63-65

सदुपयोगिता क्रम और विधि से ही सम्पूर्ण मानव में आवश्यकताएँ संयत होते हैं, समृद्घ होने की संभावना बढ़ती है। फलत: उत्पादन कार्य करने के साधनों की वृद्घि एवं समय, घटने की संभावना भी जुड़ी रहती है। क्योंकि आवश्यकता से अधिक साधन (समान्याकाँक्षा, महत्वाकाँक्षा के) एक पीढ़ी दूसरे पीढ़ी के लिए अर्पित करता रहेगा। यह मानव सहज कीर्ति है। इसी क्रम में सदुपयोगिता विधि से साधन अधिक होने के आधार पर ही समृद्घि सर्वसुलभ होना सहज है। समृद्घि के आधार पर ही उत्पादन मात्रा नियंत्रित होना भी सहज है। गुणवत्ता की ओर मानव का स्वाभाविक रुप से ध्यान होना पाया जाता है। क्योंकि हर मानव समृद्घि कल्पना के साथ ही गुणवत्ता की ओर परिकल्पना तो कर रहा है। जबकि अभी परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था इस धरती पर प्रचलित नहीं हुआ। इसके बावजूद मानव परोपकारी नेतृत्वशील व्यक्तियों को अधिकाधिक साधनों के साथ (भले ही राक्षसीयता से क्यों न हो एकत्रित किया हुआ) प्रयुक्त होता आंकलित हुआ।

परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था विधि में हर परिवार समृद्घ होना स्वाभाविक है। यह भी अभी तक स्पष्ट हो चुका है कि जागृत मानवों का समुदाय ही परिवार मानव और विश्व परिवार मानव के रूप में जीने में समर्थ होता है। - अ.श. 247–248

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