प्राणावस्था के उपरान्त ही प्राणावस्था के अवशेषों, धरती के संयोग और ऊष्मा, वायु, जल संयोग से बहुत सारे स्वेदज -कीटों, जन्तुओं का प्रकट होना आज भी देखने को मिलता है। इस क्रम में अण्डज प्रकृति रचना विरचना का होना देखा जाता है। यही क्रम से प्राणावस्था के अवशेषों सहित पुनर्प्रक्रिया क्रम में स्वेदज प्रकृति और प्रक्रियाएं विपुलीकृत होना आज भी देखना संभव है। इनमें से कुछ अण्डज विधि से अपनी परंपरा बनाना देखा जाता है। अण्डज परंपपरायें शनै:-शनै: प्रयोग विधि से उदात्तीकरण नियमों के अनुसार समृद्घ होते जलचर, भूचर, नभचर के रूप में देखने को मिलता है। इनमें पराकाष्ठा की समृद्घि, अग्रिम अवस्था की समीचीनता, अनुकूल परिस्थितियों के आधार पर अण्डज संसार से पिण्डज संसार प्रकट होने की बात इस धरती पर घटित हो चुकी है। यह भी अपने-अपने परंपरा के रूप में वंशानुषंगीय विधि से आज भी स्पष्ट है।

इन्हीं अण्डज-पिण्डज संसार रचना क्रम में शरीर रचना के लिये आवश्यकीय सभी रासायनिक द्रव्य और भौतिक वस्तुएं सहज सुलभ होने के क्रम में, मेधस रचना क्रम शरीर रचना क्रम के साथ आरम्भ होकर समृद्घ होना विकास क्रम में स्वाभाविक कार्य प्रणाली रही है। यह अण्डज-पिण्डज दोनों प्रकार के जीवावस्था का वैभव वंशानुषंगीयता को प्रमाणित अथवा व्यक्त करता हुआ देखने को मिलता है। इसी क्रम में पिण्डज प्रकटन के रूप में मानव शरीर रचना पंरपरा भी सुस्पष्ट है। मानव भी अपनी परंपरा के रूप में स्थापित हो चुका है। इन सभी घटनाक्रम के मूल में प्रत्येक परंपरा स्थापित होने की प्रक्रिया है। परंपरा स्थापित होने के उपरान्त वह मूल-क्रिया जैसे अण्डज से पिण्डज प्रकटन क्रिया का दोहराना अपने-आप शिथिल हो जाता है। परंपरा उन्नत हो जाती है। उन्नत होने का तात्पर्य परंपरा में निखार और उसका नियतिक्रम, आचरण स्पष्ट होने से है। मानव पंरपरा अनेक समुदायों के रूप जैसे (अण्डज से पिण्डज प्रकटन क्रिया) में अपने को परंपरा सहज प्रकटन प्रमाणित हो चुकी है।

अस्तित्व में प्रत्येक एक त्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में वैभव और प्रमाण है। प्रमाण का तात्पर्य वर्तमान में हर व्यक्ति इसे समझ सकता है। फलस्वरूप अपना प्रभाव स्वरूप मानव भी स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी की कल्पना, अध्ययन, निश्चय एवं प्रमाणित होने का कार्य कर सकता है। इसे हम प्रमाणित कर देख लिये हैं। यह भी इसके साथ हमें पता लग चुका है और लोग भी पता लगा सकते हैं कि समुदाय विधि से कोई सार्वभौम सूत्र नहीं पाये हैं और न ही पा सकते हैं। इसी आधार पर मानवत्व को पहचानने, निर्वाह करने के क्रम में अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिन्तन अध्ययन एक आवश्यकता रही है। यह बलवती होने के आधार पर ही इसमें हम पारंगत होने का प्रमाण सहज ही प्रमाणित हुई।

अखण्ड समाज की आवश्यकता, कल्पना केवल मानव प्रकृति अथवा मानव सहज अस्तित्व के साथ ही सूत्रित हुआ है अर्थात् और किन्हीं जीवों का समाज अथवा वनस्पतियों का समाज, मृत पाषाण, मणि, धातुओं का समाज रूप प्रमाणित नहीं होती। हर प्रजाति के जीव, हर प्रजाति की वनस्पति, हर प्रजाति के मृत-पाषाण-मणि-धातुएँ अपने-अपने त्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित हैं। अतएव समाज का केन्द्र बिन्दु अखण्ड समाज रूप में प्रमाणित होने के लिए केवल मानव ही है।

मानव विविध परम्पराओं को झेलते हुए अर्थात् राज्य, धर्म, अर्थ परम्पराओं को झेलते हुए आज इस दशक में जिस स्थिति में है उसका चित्रण इस प्रकार है :-

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