उस परमाणु सहज व्यवस्था में भागीदारी के रूप में कार्यरत रहता हुआ प्रत्येक अंश देखा गया है। इसलिये मूल मात्रा का स्वरूप परमाणु है न कि परमाणु अंश।

जैविकता का मूल रूप प्राणकोषा होना हम पहचान चुके हैं, परम्परा इसको स्वीकार भी चुका है। इसके मूल रूप में प्राणकोषा, जो स्पंदनशील कार्यकलाप सहित देखने को मिलता है, वह किस विधि से स्पंदन क्रिया में परिवर्तित हो जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर पाना भी मानव सहज अपेक्षा रही है। जबकि प्राणकोषाओं को खोल देने (तोड़ देने) पर अणु और उसके मूल में परमाणु ही होना पाया गया है। सह-अस्तित्व सहज रूप में प्रत्येक परमाणु एक से अधिक अंशों के साथ गतिपथ सहित निश्चित आचरण सम्पन्न रहना पाया जाता है। इसी गवाही से सह-अस्तित्व में ही मात्रा, सह-अस्तित्व में ही व्यवस्था (निश्चित आचरण) और निश्चित रचना स्पष्ट हो जाती है। इन तीनों विधाओं को स्पष्ट करने के क्रम में ही श्रम, गति, परिणाम रूपी क्रिया को स्पष्ट करना देखा गया है। इस प्रकार परमाणु मूल मात्रा, अनेक परमाणुओं से एक अणु, अणु अपने में एक निश्चित मात्रा, एक से अधिक प्रजाति के अणु निश्चित अनुपात (मात्रा) सहित संयोग, वातावरणिक, नैसर्गिक सह-अस्तित्व सुलभता, ऊष्मा का अनुपात के फलस्वरूप में अणुओं का अपने-अपने आचरण सर्वथा त्यागकर तीसरे आचरण के लिये सर्वथा तत्परता ही रासायनिक उर्मि के रूप में देखने को मिलता है।

ऐसे अनेक रसायन द्रव्य भौतिक रूप में किसी भी धरती में संभावित होना सहज है। ऐसे धरती में से एक धरती यह भी है। ऐसे अनेक प्रकार के रसायन द्रव्यों से समृद्घ होने के उपरान्त रासायनिक द्रव्यों का मिश्रण होना पाया जाता है। जैसे अम्ल और क्षार का मिश्रण। इसी प्रकार रसायन द्रव्य ठोस, तरल, वायु के रूप में वैभवित होना देखा गया है। ऐसा ठोस स्वरूप ही प्राण कोषाओं के रूप में भी (प्राण-कोषा रूपी रचना के रूप में भी) होना पाया जाता है। ऐसी प्राणकोषाओं में प्राण-सूत्र स्थापित होना देखा गया है। ऐसे प्राणसूत्र सहित प्राण कोषा रसायन द्रव्य में आप्लावित रहते हुए निश्चित ऊष्मा एवं दबाव सहित स्पंदनशील होना स्वाभाविक है। यही प्राणकोषा का सार्थक रूप है। ऐसे प्राण कोषा में निहित प्रत्येक प्राण-सूत्र जब तक अपने जैसे ही एक-एक प्राण सूत्र को बनाते हैं अर्थात् दोनों मिलकर पुन: दो प्राणसूत्र को निर्मित कर लेते हैं तब तक यह एक कोशीय रचना के रूप में पहचाना जाता है। जब यही प्राणसूत्र अपने ही जैसे दो-दो के दो जोड़े बना लेते हैं तब द्विकोषीय रचना कहलाते हैं। प्राणसूत्र का रचना सम्पन्न होते ही उसके लिये आवश्यकीय कोषा समीचीन रहता ही है। यही रासायनिक उर्मि का मर्म और वैभव है। इसके आगे एक-एक प्राणसूत्र अपने जैसे दूसरे सूत्र को बना लेते हैं और पुन: 2-2 बना लेते हैं। इस विधि से बहुकोषीय रचना विधि स्थापित है।

इस क्रम में एक प्रजाति की प्राणावस्था की रचना अपनी पराकाष्ठा तक सम्पन्न होने के उपरान्त, दूसरे प्रजाति की रचना के लिए उन्हीं प्राणसूत्रों में लहरे उठती हैं जिसे रासायनिक उर्मि कहा जाता है। जो परंपरा के रूप में स्थापित हो चुकी है वह बीज वृक्ष विधि से आवर्तनशील और समृद्घ होता ही रहता है और अनुसंधान क्रम में परंपरा से भिन्न एक रचना विधि प्राणसूत्र में उत्सव पूर्वक स्थापित हो जाती है। यह परंपरा विधि सम्पन्नता + रासायनिक उर्मि अथवा तरंग का संयोग से भिन्न रचना विधि सम्पन्न होना पाया जाता है। इसी क्रम में अनेक प्रजाति की रचना और उसका बीज, फलस्वरूप परंपरा आवर्तनशीलता के रूप में स्थापित होना पाया जाता है। ये सब इसी धरती पर प्रमाणित है।

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