मानव में मानवीयता ही उसकी स्वभाव गति है। वर्ग समुदाय चेतना पर्यन्त, आवेशों की स्मृतियां बनी रहती हैं। यह परस्पर समुदायों के, ऐतिहासिक प्रभावन कार्यों के आधार पर बनी हुई हैं। इससे यह भी ज्ञान हो जाता है कि एक समुदाय में सभी समुदाय, विलय नहीं हो सकते। सभी समुदायों की अस्मिता बनी रहेगी। समुदाय परम्परा में दम (हास की ओर जो आसक्ति है, उसकी समापन क्रिया) और क्षमा (विकास के लिए की जाने वाली सहायता के समय उसके हास पक्ष से, अप्रभावित रहना) का प्रमाण, ऐसी स्थिति में नहीं हो पाएगा। दम और क्षमा प्रत्येक मनुष्य के लिए आशित है। यह अखंड समाज परम्परा में ही प्रमाणित होना समीचीन है। - म.वि. 126–127
मानव चैतन्य प्रकृति के ज्ञानावस्था सहज अस्तित्व और परंपरा है। ज्ञानावस्था स्वयं इसी बात को ध्वनित करता है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान सम्पन्नता ही ज्ञानावस्था की ध्वनि का अर्थ है और सार्थकता है। यह भी देखने को मिलता है कि हर मानव निर्भ्रम और जागृत होना चाहता है। एकता-अखण्डता जागृति सहज अभिव्यक्ति है। भ्रमवश ही विखण्डता, अनेकता में विवश होना देखने को मिला है। न्याय, धर्म, सत्यरूपी परम ज्ञान, दर्शन, आचरण, व्यवस्था में एकरूपता को पाते हैं। इसी को अखण्ड समाज-सार्वभौम व्यवस्था का नाम दिया है। एकता सार्वभौम व्यवस्था सहज विधि से होता है। अखण्डता नियम और न्याय विधि से सम्पन्न होता है। समाज और व्यवस्था अविभाज्य होना स्पष्ट हो चुकी हैं। अस्तित्व में सह-अस्तित्व विधि से ही मानव जागृत परंपरा के रूप में वैभवशील हो सकता है। - आ.व. 68–69
अतएव व्यवहार में प्रयोग और अनुभव प्रमाणित होने की मर्यादा ही सार्वभौम व्यवस्था-अखण्ड समाज का स्वरूप है। - आ.व. 72
6.3 अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था: अवधारणा
वर्तमान परंपरागत विधियों से अप्राप्ति की प्राप्ति तथा अज्ञात का ज्ञात होना संभव नहीं है। इसलिए अस्तित्व सहज वैभव का चिंतन, साक्षात्कार, विचार, अनुभव, व्यवहार, व्यवस्था, संविधान, अध्ययन बनाम शिक्षा-संस्कार- बनाम दर्शन-ज्ञान सहज रूप में जीना, क्रियारत रहना अनिवार्य हो गया। इस क्रम में अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण, मानवीय व्यवस्था, मानवीय संविधान, मानवीय शिक्षा, मानवीय संस्कार सर्व सुलभ होने का मार्ग प्रशस्त होता है। इन मूलभूत सिद्घांतों को हृदयंगम करना एक आवश्यकता है। अनुभव पूर्वक मानव के दृष्टा पद में होने की साक्षी में ही मूलभूत सिद्धांतों को समझा गया है।
मानव जाति एक, कर्म अनेक।
- मानव धर्म एक, मत अनेक।
- सत्ता व्यापक रूप में एक, देवता अनेक।
- यह धरती एक (अखण्ड राष्ट्र ) राज्य अनेक।