व्यापारी विद्वान संग्रह की निरर्थकता को बयान करते रहते हैं। कायिक, वाचिक, मानसिक रूप में संग्रह को दिन में दूनी रात में चौगुनी बनाने की सार्थक तिकड़म, तिकड़म का तात्पर्य अपने दूषित मानसिकता को सफल बनाने के तरीकों जिसको वह स्वयं विरोध करता है, में लगे रहते हैं। शिक्षाविद भी संग्रह तंत्र से जकड़ चुके हैं। यह अपने समय को बेचकर आजीविका चलाने के लिए तत्पर हो गए हैं।
इस प्रकार शिक्षा-व्यापार, धर्म-व्यापार, राज्य-व्यापार, वस्तु-व्यापार और व्यापार में अधिकार प्राप्त पारंगत सभी व्यक्ति संग्रह के चंगुल में ही जकड़े हुए दिखाई देते हैं। अपवाद रूप में कोई-कोई संग्रह समर्थ न हो पाए हों। ऐसे लोगों का खास आदर्श कम से कम लोगों में अंकित हुआ हो सकता है। सर्वाधिक लोगों का मन में सर्वाधिक संग्रह समर्थ लोगों का ही कार्य चित्र बसता ही जा रहा है। कलाकारों को कहना ही क्या है ? भिखारी से भिखारी का अभिनय करने को तैयार है और ज्यादा से ज्यादा पैसा-धन चाहिए। इन कलाकारों से मार-कूट, दहाड़-विध्वंस व्यापार-प्यार में पागल होने वाले गाने, जितने भी द्रोह-विद्रोह का अभिनय, त्याग, तपस्या का अभिनय एक ही व्यक्ति से करा ली जाए, उनको सिर्फ पैसा चाहिए। इनके संग्रह जब तक धर्म, राज्य, वस्तु, व्यापारियों, बिचौलियों से संग्रह शिखर ऊपर नहीं गया तब तक ये चैन से कोई अभिनय नहीं कर पाते हैं और आगे की बेचैनी बनी ही रहती है। अतएव सभी आयामों में कार्यरत व्यक्ति का आदर्श उन्नीसवीं शताब्दी से संग्रह युग सर्वाधिक प्रचुर होता आया और बीसवीं शताब्दी से प्रखर होता हुआ देखा गया।
उसके पहले राजगद्दी और धर्मगद्दी में कोष संग्रह की बात रही। इन दोनों में से सर्वाधिक संग्रह राजकोष में होना पाया जाता रहा। बीसवीं शताब्दी में वस्तु व्यापार, बिचौलियों का संग्रह बुलंद हुआ। बीसवीं शताब्दी के मध्य से ही बिचौलियों और कलाविदों का तेवर ज्यादा संग्रह की ओर तीव्रता से बढ़ा। इसी के साथ-साथ विश्व सुन्दरियों की मानसिकताएँ संग्रह समर्थता की ओर प्रवृत्तशील होना देखा गया। ये सब कहानी कहने के मूल में एक ही बात है जो-जो स्मरणीय तबके ख्यात होने वाले पद में आसीन व्यक्ति कुल मिलाकर संग्रह के चक्कर में ही चक्कर काटता हुआ दिखाई पड़ते हैं। अन्य सामान्य सभी व्यक्ति इन्हीं का लक्ष्यों, रहन-सहन, भोग-बहुभोग आदि क्रियाकलापों से प्रभावित प्रवृत्त होना पाया गया। इसी विधि से सर्वाधिक जन मानस में संग्रह और भोगेच्छाएँ तीव्रता से प्रभावित हुई। इससे यह तथ्य को स्मरण कराना रहा कि प्रकारान्तर से कोई भी संग्रह करे इसी धरती का वस्तु या वस्तु का प्रतीक पत्र मुद्रा को ही होना देखा गया। संग्रह के साथ-साथ द्रोह-विद्रोह-शोषण-युद्घ मानसिकता बना ही रहता है। यह मानसिकता कितने भी ऊँचाई तक पहुँच गई हो पर अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र व्याख्या नहीं बन पाई। जबकि सार्वभौम शुभेच्छा और अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था की प्यास बना ही है। इसलिए लाभोन्मादी अर्थशास्त्र के विकल्प को अवगाहन करना आवश्यक होगा। - म.वि. 30–33
6.2 अखंडता सार्वभौमता – आवश्यकता
‘मात्रा का स्थिर बिन्दु’ मानव आज तक पाया नहीं। इसका कारण परमाणु अंश में मूल मात्रा (स्थिर मात्रा) को खोजने गये जबकि अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व में अथवा सह-अस्तित्व रूपी प्रमाण रूप में किसी न किसी परमाणु में और