सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी संभव नहीं है। इसलिए अमानवीयता से मानवीयता में संक्रमित होना ही आज की आवश्यकता है। अमानवीय चार प्रवृत्तियां विषय, संग्रह, सुविधा और भोग में ग्रसित रहना पाया जाता है।
मानवीय दृष्टियां न्याय, धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) तथा सत्य हैं। इसी के आधार पर अर्थात् जीवन प्रकाश प्रभावशील होने की स्थिति में ही समाज न्याय, सार्वभौम व्यवस्था और प्रामाणिकता सहज सुलभ हो जाती है। यही अमानवीयता से मानवीयता की ओर गति भी है। यही मानव की वांछा, आशा व आकांक्षा है।
सम्बन्धों को पहचानने व मूल्यों का निर्वाह करने के क्रम में, समाज न्याय का उभय तृप्ति के रूप में लोकव्यापीकरण होता है। तभी मानव, परिवार व्यवस्था के रूप में, जीने की कला को, अभिव्यक्त कर पाता है। ऐसी स्थिति में सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है। सार्वभौम व्यवस्था का सूत्र, परिवार-मूलक विधि से सूत्रित होकर, ग्राम-स्वराज्य में सार्वभौम स्वराज्य व्यवस्था का छोटा रूप प्रमाणित होता है। यही “परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था’’ होने का सूत्र और संभावना है।
अभी तक इस पृथ्वी पर जितनी भी राजगद्दियां और धर्म गद्दियां हैं, वे रहस्य से मुक्त नहीं हो पाईं हैं। जिस मानसिकता से ये गद्दियां स्थापित हुई हैं, उस मानसिकता के चलते रहस्य से मुक्त नहीं हो सकती और इससे शक्ति केन्द्रित शासनवाद में परिवर्तन नहीं हो पाता। जबकि सह-अस्तित्व में पूरक विधि और सार्वभौम व्यवस्था (अथवा समग्र व्यवस्था) नित्य वर्तमान है। दूसरे शब्दों में, सह-अस्तित्व ही पूरक विधि से समग्र व्यवस्था के रूप में वर्तमान है। मनुष्य ने ही अपनी कर्म-स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता वश अस्तित्व सहज व्यवस्था को अनसुनी, अनदेखी करते हुए, सभी प्रकार से प्रताड़ित होने का, ताना बाना बना लिया है। जैसे - शासन करने का हजारों वर्षों का प्रयास सदा पाश्विक रहा।
इसका प्रमाण है कि परस्पर शासन कार्य से बैर बढ़ते ही रहा। परिवर्तन की आवश्यकता, हर परिवर्तन के अनंतर भी बनी रही। युद्घ के अनंतर युद्घ की तैयारियां, आश्वासनों के अनंतर आश्वासन की तैयारियां, मतभेदों के अनंतर मतभेद, हर समझौते के अनंतर उसी में प्रश्न चिन्ह, इसी के साथ संग्रह के अनंतर पुन: संग्रह, सुविधा के अन्तर पुन: सुविधा तथा भोग के अनंतर पुन: भोग इसके प्रश्न चिन्ह बन जाते हैं। यह अव्यवस्था का द्योतक है। - म.वि. 120–121
भाषा और मानव भाषा में जो महत्ताएँ हैं, उन तत्वों को यहाँ समझ लेना प्रासंगिक होगा। इसके मूल में मानव को एक जाति के रूप में पहचानना एक अनिवार्यता है- क्योंकि संघर्ष युग से समाधान की ओर संक्रमित होने के लिए मानव को एक जाति के रूप में पहचानना बहुत आवश्यक है। इसमें अर्थात् मानव को एक जाति के रूप में पहचानने में जो कठिनाइयाँ गुजरीं, उसे मानव के विभिन्न इतिहासों में स्पष्ट किया गया है। पुन: इस बात को ध्यान में लाना आवश्यक है कि किसी नस्ल, रंग, जाति, सम्प्रदाय, वर्ग अथवा धर्म कहलाने वाले मत-मतान्तर अथवा मतभेदों से भरे हुए धर्म, पंथ, भाषा या देश के आधार पर सम्पूर्ण मानव को एक जाति के रूप में एक इकाई के रूप में पहचाना नहीं जा सका। मानव की एक जाति के रूप में, एक इकाई के रूप में पहचानने के लिए मूल तत्व सार्वभौम व्यवस्था ही है। जिस व्यवस्था का सूत्र मानवत्व ही है। - भ.व. 96-97
मानव में मानवत्व ही व्यवस्था सूत्र है एवं स्वयं में व्यवस्था तथा समग्र व्यवस्था में भागीदारी होने का ध्रुव है। दूसरा ध्रुव स्थिरता और निश्चयता पूर्ण अस्तित्व ही है। इन दोनों ध्रुवों के बीच में समग्र व्यवस्था में भागीदारी को और स्वयं ही प्रत्येक व्यक्ति एक व्यवस्था है, इस सहज सत्य को अध्ययन कर सकता है।