सर्वमानव पा सकता है, जो कुछ भी हम करते हैं उसे सर्वमानव कर सकता है। जितना भी हम जीने देकर जिया हूँ हर व्यक्ति जीने देकर जी सकता है; मैं व्यवस्था में जीता हूँ सर्वमानव व्यवस्था में जी सकता है या जियेगा। मैं समाधान सहज निरंतरता में सुखी हूँ। हर व्यक्ति समाधान सहज विधि से सुखी है या सुखी हो सकता है। मैं न्याय और नियमपूर्वक हर कार्य-व्यवहार को निश्चय करता हूँ और क्रियान्वयन करता हूँ वैसे ही हर व्यक्ति निश्चयन करता है और निश्चयन कर सकेगा। मैं प्रामाणिक हूँ हर व्यक्ति इस धरती पर प्रामाणिक होगा और प्रामाणिक हो सकता है। इस विधि से मानसिकता, विचार और समझदारी संपन्न होना है। ऐसा जीना ही मानव का परिभाषा मानवीयतापूर्ण आचरण सार्वभौम व्यवस्था व अखण्ड समाज और समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व का नित्य वैभव है। यही जागृत मानव समाज का स्वरूप कार्य-विचार और नजरिया है। - स.श. 255
जागृत मानव में जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना सदा-सदा कार्यरत रहना पाया जाता है। यह मूलत: समझने योग्य क्षमता, सम्पन्नता की ही जागृति है। हर मानव में जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने की गवाही स्पष्ट होता है या स्पष्ट करना चाहते हैं अथवा स्पष्ट होने के लिए बाध्य रहते ही हैं। बाध्य रहने का तात्पर्य स्वीकृत रहने से है। क्योंकि जागृति हर मानव में स्वीकृत होता है। - स.श. 255
दूसरे विधि से यही समझदारी अनुरूप विचार शैली के अनुरूप कार्य-व्यवहार और कार्य-व्यवहार का फल-परिणाम का सटीक मूल्यांकन पुन: समझदारी की पुष्टि, यही आवर्तनशील होना पाया जाता है। इसी क्रम में समझदारी को स्वत्व के रूप में, विचार शैली को स्वतंत्रता के रूप में, कार्य-व्यवहारों का अधिकारों के रूप में वर्तमान होना पाया जाता है। इस प्रकार जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना ही स्वत्व, स्वतंत्रता और अधिकार है। यह हर मानव में जागृति पूर्वक वर्तमान होना ही/रहना ही मानव परंपरा का वैभव है। यही वैभव परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था के रूप में प्रमाणित रहता है। व्यवस्था में भागीदारी स्वयं समाधान मानव धर्म का द्योतक है। न्याय प्रदायी विधियाँ समाज का द्योतक हैं। जागृति सहज सम्पूर्ण प्रमाण सत्य का द्योतक है। इस प्रकार न्याय, धर्म, सत्य पूर्ण जीवन क्रियाकलाप जागृत संचेतना के रूप में नित्य प्रमाण होता है। ऐसा स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार हर व्यक्ति के लिये, हर परिवार के लिये, सम्पूर्ण मानव के लिये समान रूप में समीचीन है।
जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने की सम्पूर्ण वस्तु सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य ही संपूर्ण वस्तु, अस्तित्व में परमाणु में विकास क्रम, विकास, परमाणु अपने में गठनपूर्णता के फलस्वरूप चैतन्य पद में संक्रमण ‘जीवन पद’, जीवनी क्रम में जीवावस्था, मानव में जीवन जागृति क्रम, जागृति और उसका परंपरा जागृत मानव परंपरा में और रासायनिक-भौतिक रचना-विरचनाएं हैं। इन सभी मुद्दों का अध्ययन पूर्वाध्यायों में स्पष्ट हुआ है।
जानने-मानने का अधिकार जागृत मानव में ही प्रमाणित होता है। ऐसा जानने, मानने के आधार पर सम्बन्धों का पहचान होता है। हर संबंध में निश्चित प्रयोजन स्वीकृत रहता है। उन सम्बन्धों में लक्षित प्रयोजनों को निर्वाह करना ही समाज सूत्र का आधार है। इसीलिये पहचानना, निर्वाह करना एक आवश्यकता और विधि है। इसका मूल्यांकन हर स्थिति में होना ही समाज है। समाज का परिभाषा भी इसी तथ्य को इंगित कराता है क्रियापूर्णता के अर्थ में गतिशीलता ही समाज है। पूर्णता का स्वरूप मानव परंपरा में मानवत्व सहित अखण्ड समाज - सार्वभौम व्यवस्था सूत्र और व्याख्या स्वरूप ही है। सार्वभौम व्यवस्था स्वरूप स्वयं में परिवार मूलक स्वराज्य सभा विधि से पाँचों आयाम