6.9 जागृति पूर्वक ही समाज है

मानव परम्परा का संतुलन अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रामाणिक होना सहज है। यह दोनों अविभाज्य रूप में प्रतिष्ठा और गरिमा है। मानव कुल का संतुलन सर्वतोमुखी समाधानपूर्वक ही सम्पादित होना पाया जाता है क्योंकि सर्वतोमुखी समाधान सम्पन्न परिवार संतुलित रहना पाया गया है। हर परिवार में एक से अधिक व्यक्तियों का होना सर्वविदित है अथवा सम्मिलित कार्य-व्यवहार का होना पाया जाता है। परिवार की परिभाषा भी इसी तथ्य को पुष्ट करता है यथा परिवार में प्रस्तुत अथवा सम्मिलित सभी व्यक्ति एक दूसरे के साथ संबंध को पहचानते हैं एवम् मूल्यों का निर्वाह करते हैं, मूल्यांकन करते हैं और उभय तृप्ति पाते हैं और परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य में सभी पूरक होते हैं। इन्हीं आधारों पर समाधान और समृद्धि का प्रमाण प्रस्तुत हो पाता है। मानव का परिभाषा समाहित रहता ही है यथा मनाकार को साकार करने वाला मनः स्वस्थता सहज प्रमाण प्रस्तुत करने वालों के रूप में होना देखा गया है।

उद्देश्य - समाज परिभाषा में पूर्णता की ओर निर्देश है, अस्तित्व में परमाणु का विकास और जागृति सहज अध्ययन क्रम में गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता और इसकी निरंतरता को देखा गया है। देखने का तात्पर्य समझने से ही है। परमाणु का वैभव को, अस्तित्व में व्यवस्था की मूल इकाई के रूप में इनके कार्यकलापों को देखा गया है। यह जड़-चैतन्य प्रकृति के संबंध में स्पष्टतया समीकरण होता है। परमाणु अंशों से ही परमाणु रचित रहना पाया जाता है। हर अवस्था में आवेश अव्यवस्था का द्योतक है जैसे मानव में पायी जाने वाली छैः प्रकार के आवेश अव्यवस्था का द्योतक होना देखा गया है। मानव में घटित होने वाले आवेशों को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य के रूप में गणना किया गया है। यह मानव कुल में चर्चित, विश्लेषित, निष्कर्षित विवशता है। प्रत्येक आवेश विवशता के रूप में मानव सहज मानस विधि से मूल्यांकित होता है। मानव सहज मानसिकता मानवीयतापूर्ण विधि से कार्यरत रहना पाया जाता है।

किसी व्यक्ति, परिवार, समुदाय को अथवा संपूर्ण समुदायों को विवशतायें स्वीकृत नहीं हो पाती हैं। यही मुख्य बिन्दु है जिस पर विचार करना आवश्यक है। विवशताओं से मुक्ति हर एक मानव में आवश्यकता के रूप में होना पाया जाता है, ऐसे विवशता का मूल रूप ही बंधन है। ऐसे बंधनों के स्वरूप को आशा, विचार, इच्छा बंधनों के रूप में देखा गया है। यह जीवनगत क्रिया रूपी आशा, विचार, इच्छायें भ्रमित रहने पर्यन्त बंधन का, बंधन पर्यन्त आवेशों का, सम्पूर्ण आवेश पर्यन्त विवशताओं का होना आंकलित होता है। इसे प्रत्येक व्यक्ति निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण पूर्वक समझ सकता है। - स.श. 29

आशा बन्धन इन्द्रियों द्वारा सुखी होने के लिए दौड़ लगाने के लिये सभी क्रियाकलाप के रूप में गण्य है। विचार बन्धन कोई भी व्यक्ति अथवा समुदाय अपने विचार को श्रेष्ठ मानने की विधि से स्पष्ट होता है। इच्छा बन्धन, ज्यादा से ज्यादा रचना कार्य की श्रेष्ठता को स्पष्ट करने के क्रम में स्पष्ट होता है। यह भी चित्रण विधि से स्पष्ट होता है।

मानव जीवन के अध्ययन क्रम में यह पाया गया है, जीवन ही भ्रम अथवा अजागृतिवश किये जाने वाली क्रियाकलाप भ्रम के रूप में बंधन को और जागृति पूर्णतापूर्वक बंधन से मुक्ति को अनुभव करना एक सहज क्रिया है। इस प्रकार जीवन जागृति ही बंधन मुक्ति का स्वरूप होना, कार्य होना, व्यवहार होना, व्यवस्था और आचरण होना पाया गया

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