है। - आ.व. 144 (*इस ढंग से) मानव परंपरा का अपनी जागृति को प्रमाणित करने के लिए जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान में, से, के लिए प्रमाणित रहना आवश्यक है। इसी के फलस्वरूप परिवार मूलक स्वराज्य और अखण्ड समाज रहना और सार्वभौम व्यवस्था सहज प्रमाणित होना संभव हो जाता है। मानव के जितने भी कार्य-व्यवहार होते हैं उसके मूल में निर्धारित विचार का होना एक अनिवार्यता है। मानव के द्वारा हर कार्य-व्यवहार के मूल में विचार रहता है, उसकी दो ही अवस्था होती है:-
1. जागृति सहज विचार,
2. भ्रमित विचार।
भ्रमित विचार पूर्वक किए गए सभी कार्य-व्यवहार से समस्याओं की पीड़ा ही स्पष्ट होती है। उस स्थिति में मानव सहज ही समाधान को वरता है, न कि समस्या को। यह आते कहाँ से हैं यह पूछने पर स्पष्ट रूप में यही दिखाई पड़ता है कि भ्रमित परंपराओं वश, मानव न चाहते हुए भी भ्रमित कार्यों को कर देते हैं। जबकि जागृतिपूर्वक सर्वतोमुखी समाधान पूर्ण कार्य-व्यवहार करता है।
मानव हर हालत में सुख ही चाहता है, न जानते हुए भी समाधान ही चाहता है। इसके बावजूद समस्या उत्पन्न कर देता है। मानव के चाहने और होने के बीच में जानना, मानना, पहचानना एक आवश्यकता है। समुदाय परंपरा में प्रत्येक व्यक्ति अर्पित रहता है। प्रत्येक समुदाय परंपरा इस दशक तक भ्रमित है, इसका साक्ष्य ही है कि मानव सर्वतोमुखी समाधान, सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज और इनमें पारंगत और भागीदार होने के सारे अध्ययन को और प्रमाणों को शिक्षा पूर्वक संस्कार पूर्वक, संपन्न नहीं कर पाये हैं।
रुचि मूलक कार्यकलापों का सार्वभौम न होना तथा न्याय, धर्म, सत्य का सार्वभौम होना देखा गया। इसलिए मानव, जीवन सहज रूप में शुभ चाहते हैं। रुचिवश हर समुदाय भ्रमित कार्यों को करता रहा है। जब तक रुचि मूलक विधि से मानव कार्य-व्यवहार करता है, तब तक अनर्थ करता है। सम्पूर्ण रुचियाँ इंद्रिय सन्निकर्षात्मक रूप में हैं। अर्थात् शरीर के अनुरूप हो ऐसा काम कर देते हैं। इन्द्रियों के साथ न्याय का स्थान नहीं है। न्याय सब चाहते हैं। इन्द्रियों के साथ प्रिय, हित, लाभ ही होता है। प्रियात्मक कार्यकलाप शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इन्द्रियों को अच्छा लगने के रूप में स्पष्ट है। हित शरीर के लिए उचित-अनुचित के रूप में देखा जाता है। कम देकर अधिक लेने की प्रक्रियाओं को लाभ के रूप में देखा जाता है। यही क्रियाकलाप रुचि मूलक है। प्रिय, हित, लाभ का कहीं तृप्ति बिंदु मिलता नहीं है। शरीर को कितना भी अच्छा रखा जाय, तो भी शरीर की विरचना होती ही है। इन्द्रिय सन्निकर्ष क्रियाकलापों के साथ परेशानी यही है कि जब एक चीज, किसी एक मानव को अच्छी लगती है तो वही चीज दूसरों को बुरी भी लगती है।
दूसरा बहुत अच्छा खाने वाले को भी कहीं न कहीं पेट भर जाने की स्थिति आती है, उसके बाद वही खाना खराब लगने लगता है। एक आदमी को खराब लगने की स्थिति में दूसरा आदमी जो भूखा है उसे वही खाना अच्छा लगता है। एक आदमी को एक संवेदना में कितना देर अचछा लगा-बुरा लगा, सबके लिए वैसा होना होता नहीं अत: अच्छा लगना, बुरा लगना सार्वभौम हो नहीं पाता है और लाभ का तृप्ति बिंदु कहीं होता नहीं। संग्रह का तृप्ति बिंदु होता नहीं है, इसलिए लाभ का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं होता, इसलिए यह सार्वभौम नहीं होता। अस्तु, ये जिनती भी चीजें