7. मानवीय सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था सर्वमानव में, से, के लिये समान है

संस्कृति का स्वरूप के सम्बन्ध में पहले भी सामान्य विवरण प्रस्तुत किये गये हैं। मानवीय संस्कृति का पोषण सभ्यता करती है, सभ्यता का पोषण विधि करती है, विधि का पोषण व्यवस्था करती है और व्यवस्था का पोषण संस्कृति करती है। इस प्रकार आवर्तनशीलता क्रम सुस्पष्ट है। संस्कृति का मूलरूप संस्कार है। संस्कार का मूलरूप जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान ही है। अस्तित्व और मानव से संबंधित अध्ययन बोधगम्य होना ही शिक्षा-संस्कार का तात्पर्य है। ऐसी शिक्षा-संस्कार ही मानवीयतापूर्ण परम्परा का मार्गदर्शक होता है। मानवीयतापूर्ण परम्परा अपने-आप में ऊपर कहे चारों आयाम सम्पन्न रहता ही है। ऐसी शिक्षा-संस्कार से प्राप्त स्वीकृतियों, अवधारणाओं, अनुभवों, विचार शैली सहित सर्वतोमुखी समाधान मानसिकता से सम्पन्न होना ही मानवीय संस्कार सफलता का प्रमाण है। यही सभ्यता का आधार है। मानवीयतापूर्ण सभ्यता स्वाभाविक रूप में न्यूनतम परिवार सभा से विश्व परिवार सभा सहज भागीदारियों को निर्वाह कर लेना ही है। अर्थात् व्यवस्था के रूप में जीना ही, समग्र व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह करना ही सभ्यता का तात्पर्य है।

सभ्यता में ही शिष्टता समाया रहता है। प्रमाण भी समाया रहता है। अनुभव, व्यवहार और प्रयोग के रूप में ही प्रमाणों का प्रयोजन दिखाई पड़ता है। मानव प्रयोजन सर्वशुभ ही है। इसलिये मानव संस्कारों को सर्वशुभ के अर्थ में ही स्थापित करना सहज है। ऐसे सभी स्तरीय परिवार और सभा सहज आचरणों को मानवीयतापूर्ण आचरण और व्यवस्था में भागीदारी का नाम दिया गया है। यही संविधान सूत्र है। इसे हम अध्ययन भी करते हैं और आचरण में पाकर तृप्त होते हैं अथवा आचरण रूप में पाकर तृप्त होते हैं। इस प्रकार मानव सहज तृप्ति का स्रोत मानवीयतापूर्ण आचरण में होना स्पष्ट होता है। क्योंकि अस्तित्व रूपी सह-अस्तित्व ही समाधान और तृप्ति का सम्पूर्ण स्रोत है। मानव में ही जागृति सहज अधिकार प्रमाणित होता है। जागृति और सह-अस्तित्व के योगफल में ही सर्वशुभ सर्वसुलभ होना पाया जाता है। अतएव मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी संविधान को पहचानना ही राष्ट्रीय मूल्य, चरित्र और नैतिकता का अथवा परिवार मूलक अखण्ड स्वराज्य व्यवस्था का आचार संहिता स्वाभाविक रूप में सर्वमानव के लिये बोधगम्य और व्यवहार गम्य होता है। अतएव सभ्यता का पोषण मानवीयतापूर्ण आचरण जो व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में होता है, इसे अध्ययन करना आवश्यक है।

व्यवस्था का स्वरूप पहले पाँच आयामों में इंगित किया जा चुका है। सुख का सम्पूर्ण स्रोत अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व ही होते हुए मानव जागृतिपूर्णता विधि से ही सर्वशुभ सर्वसुलभ होना पाया जाता है। अतएव इन तीनों विधा में सामरस्यता विधि ही अर्थात् परिवार सभा, ग्राम मुहल्ला सभा और विश्व सभा सहज व्यवस्था हमें सर्वसुलभ कर लेना ही आज के सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान है। जितने भी बिगाड़े गये हैं उसका पुन: सुधार किन्हीं-किन्हीं भागों में पूर्णतया हो सकती है और किसी-किसी भागों में आंशिक सुधार हो सकती है, धरती आज से अधिक स्वस्थ हो सकती है। धरती पर मानव युगों तक समाधान, समृद्घि, अभय, सह-अस्तित्व पूर्वक रह सकता है। यह व्यवहारवादी समाजशास्त्र का प्रस्ताव है। - स.श. 107 – 124

Page 282 of 335