सहित गतिशील रहना स्पष्ट है। नैसर्गिक सम्बन्ध और मानव सम्बन्ध और उसमें निहित प्रयोजनों को सार्थक बनाने के क्रियाकलापों को निर्वाह नाम दिया गया है। - स.श. 261
(*मानव) सुदूर विगत से ही कम से कम चार आयामों में अपने परम्परा को बनाये रखे है। जैसा शिक्षा, संस्कार, विधि और व्यवस्था। दूसरे विधि से संस्कृति, सभ्यता, विधि और व्यवस्था है। इसे सभी समुदायों में स्वीकारा हुआ और निर्वाह करता हुआ देखने को मिलता है चाहे सार्थक न हो। इससे सुस्पष्ट हो जाता है भले ही मानव कुल अनेक समुदायों में बंटे क्यों न हों यह चारों अथवा चहुँ-दिशा वादी परम्परायें सभी देशकाल में सभी समुदाय में देखने को मिला। इन चारों आयामों में मानवीयता को समावेश कर लेना ही मानवीयतापूर्ण परम्परा का तात्पर्य है। जैसा मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार, विधि एवं व्यवस्था, संस्कृति, सभ्यता ही मानव परम्परा में अखण्डता का सूत्र है। - स.श. 29
मानव परम्परा का संतुलन अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रामाणिक होना सहज है। यह दोनों अविभाज्य रूप में प्रतिष्ठा और गरिमा है। - ज.व. 271,278
सह-अस्तित्व सहज रूप में ही आवर्तनशीलता प्रभावशील होने के कारण मानव जागृतिपूर्वक आवर्तनशील विधि से जीने की कला को विकसित करता है। इसका कारण तत्व यही है कि मानव परंपरा सहज रूप में अस्तित्व में विश्वास करता है, इसका तात्पर्य जागृति है। अस्तित्व में जागृति, सह-अस्तित्व में जागृति, विकास प्रणाली में जागृति, जीवन में जागृति, भौतिक-रासायनिक रचना-विरचना में जागृति, पूरकता में जागृति, उदात्तीकरण में जागृति, ''त्व” सहित व्यवस्था में जागृति, मानवत्व सहित मानव अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी निर्वाह करने में जागृति; प्रामाणिकता, स्वानुशासन, सर्वतोमुखी समाधान, समाज न्याय में जागृति, समृद्धि और अभयता में जागृति, क्रियापूर्णता, आचरण पूर्णता और उनकी निरंतरता में जागृति सर्वसुलभ रहने के आधार पर ही मानव परंपरा जागृत रहने का प्रमाण अक्षुण्ण रहता है। ये सभी मुद्दे, ये सभी बिंदुएँ अस्तित्व दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयतापूर्ण आचरण पूर्णत: उसी निरंतरता में समाए रहते हैं। फलस्वरूप मानवीयतापूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि व व्यवस्था सर्वसुलभ हो जाती है। यही मानव कुल की महिमा है। इस विधि से युद्घ, शोषण, द्रोह-विद्रोह विहीन सह-अस्तित्व सहज समाज रचना और सार्वभौम व्यवस्था मानव कुल के लिए सहज सुलभ होगी।
मानव में, परम्परा में, संतुलन- शिक्षा विधि से संभव
जागृत शिक्षा-संस्कार विधि से प्रत्येक मानव जागृत होना पाया जाता है। शिक्षा ग्रहण करने की अर्हता सम्पूर्ण मानव में विद्यमान है। जीवन अनेक बार अथवा मानव बारंबार, मानव परंपरा में जागृत होने का प्रयत्न करता है। इसे हम सब देखे हुए हैं। मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार उपलब्ध होने के उपरान्त ही हर मानव में, से, के लिये संतुलन एक नित्य