और संस्कार विधियों को लिखा हुआ है। हर समुदाय ईश्वर कृपा को पाने के लिये विभिन्न प्रकार के साधना-अभ्यास परम्पराओं को बनाए रखे हैं। इसमें सबका गम्यस्थली ध्यान और समाधि मानी गई है।

ऐसे निश्चित ध्यान के लिये विविध उपायों को अपने-अपने परंपरा के अनुसार स्थापित किये हुए हैं। सम्पूर्ण प्रकार से प्रस्तावित ध्यान क्रियाएँ विचारों को सीमित और एक बिन्दुगत होने के उद्देश्य से किया जाता है। इसमें कोई-कोई सफल भी हो जाते हैं। सफल होने का तात्पर्य विचारों का उपज न्यूनतम अथवा शून्य अर्थ में मानी जाती है। ऐसे मानसिकता को मौन होना भी माना जाता है। निर्विचार होना भी माना जाता है। इसी को कैवल्य अवस्था या परम सुखद अवस्था मानी गई है। उल्लेखनीय तथ्य यही है ऐसे स्थिति में उनके पास कोई कार्यक्रम होना संभव नहीं होता।

इस मुद्दे पर यह अनुभव किया गया है कि निर्विचार (समाधि) के अनंतर किसी प्रकार का व्यावहारिक आशा, विचार, इच्छा अनुसार भी कोई कार्यक्रम उपजता नहीं है। फलस्वरूप समाधि के अनंतर उस व्यक्ति का उपयोग सिद्घ होना भी नहीं बनता है। इसके मूल तत्व को इस प्रकार पहचाना गया कि विचारों का उद्गम किसी न किसी चित्रण क्रिया के आधार पर सम्पन्न होना देखा गया है। सम्पूर्ण विचारों का उद्गमन ‘‘है, चाहिए और करना’’ इन्हीं मूल ध्रुवों के आधार पर निर्भर रहता है। यह ‘‘मुझे कुछ करना है, मेरे पास कुछ है और मुझे कुछ चाहिये’’ यही ध्रुव है। सम्पूर्ण व्यक्तियों में विचारों का उद्गमन हो पाता है। विचार शून्यता के अनंतर आदमी जीवित रहने का कोई कड़ी नहीं बनता है। इसीलिये ऐसे समाधि के अनन्तर अथवा समाधि में रहते ही शरीर शान्त होने का सूचनाओँ को कथाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यदि कुछ दिन, मास, वर्ष समाधिस्थ व्यक्ति जीवित रहता है (शरीर के साथ) ऐसे स्थिति में उन्हीं-उन्हीं परंपरा के मूल ग्रन्थों का प्रतिपादन का समर्थन करते हुए देखने को मिलता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि ‘‘है, करना है, चाहिये’’ के साथ निषेध लगाना ही निर्विचार होने का सूत्र बना। अस्तु, सम्पूर्ण विचार जब तक चित्रण मूलक विधि से परिसीमित रहता है, कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय व्यापार और उससे सम्बन्धित नैसर्गिकता ही ‘‘है, करना है, चाहिए’’ का आधार बना रहता है। - आ.व. 154-155

इसी आधार पर किसी आकार प्रकार की वस्तु को ध्यान करने की बात भी किया जाता है। ऐसी ध्यान में हर साधक में निहित कल्पनाशीलता का ही प्रयोग होना देखा गया है। ऐसी कल्पनाशीलता का प्रयोग बारबार हर दिन किया जाना भी देखा गया है। इसका अंतिम परिणाम और सार्थक परिणाम निर्विचार स्थिति होना जिसे ‘समाधि’ का भी नाम दिया जाना प्रचलित है। ऐसे स्थिति को भी अर्थात् निर्विचार स्थिति से भी गुजरा गया। भले प्रकार से गुजरने के उपरान्त समाधि का विश्लेषण कार्यक्रमों से और कार्यक्रम संबंधी प्रवृत्तियों से मुक्ति दिखाई पड़ती है। इसी को स्वान्त: सुख और चरमोपलब्धि के रूप में महिमा गायन किये हैं। जिसका विश्लेषण की कसौटी में कसने पर पता चला निर्विचार स्थिति के उपरान्त मानव का उपयोग शून्य हो जाता है। फलस्वरूप संयम साधना अपनाकर देखा जिसके फलस्वरूप सह-अस्तित्व ही समझ में आया जिसकी सम्प्रेषणा और अभिव्यक्ति में और लोगों को सह-अस्तित्व अध्ययन गम्य होना प्रमाणित हुई। इसी अभिव्यक्ति क्रम में ‘‘अनुभवात्मक अध्यात्मवाद’’ भी मानव सम्मुख प्रस्तुत किया गया।

जहाँ तक मनोकामनावादी अपेक्षाएँ होती हैं अधिकांश मानव में उसकी आपूर्ति हो ही जाती है जिसे साधना का फल माना जाता है जबकि ऐसी आपूर्तियाँ बिना साधना किये मानव को भी होते रहते हैं। इसीलिये साधना से मनोकामना पूरी हुई इस बात का चिन्हित प्रमाण नहीं मिल पाता है। यह केवल आस्था सूत्र और घटना काल के आधार पर

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