सम्बोधन लगाने की बात आती है। यह सब प्रकारान्तर से भय-प्रलोभन का ही गठबन्धन है जबकि निर्विचार स्थिति में भय-प्रलोभन का कोई प्रभाव दिखाई नहीं पड़ती। अभाव की पीड़ा भी नहीं दिखती। इसीलिये भूत-भविष्य का पीड़ा एवं वर्तमान का विरोध नहीं रहता। इसी को स्वान्त: सुख का नाम देना समीचीन दिखा है। स्वान्त: सुख का प्रमाण समाज के रूप में सर्वसुख के रूप में परिवर्तित होने का कोई सूत्र नहीं रह जाती है। इसीलिये इस अवस्था में प्रवेश पाने का भी काल निर्णय नहीं हो पाती। यह भी इसके साथ देखा गया है कि सम्पूर्ण ईमानदारी, निष्ठा ‘समाधि स्थिति’ के प्रति अर्पित रहने के क्रम में ही समाधि स्थली तक मन, बुद्घि, चित्त, वृत्तियाँ प्रवेश कर पाते हैं। फलस्वरूप इनकी कोई गति शेष नहीं है ऐसा बन पाता है जिसका निर्विचार स्थिति नाम दिया गया है। ऐसे घोर साधना के उपरान्त उस मानव का प्रयोजन ही, कार्यक्रम ही प्रसवित न हो ऐसे समाधि या निर्विचार स्थिति को कितने लोग चाह पाते हैं - यह प्रश्न चिन्ह में आता है। इसके उत्तर में विरले लोग ही चाह पाते हैं। ऐसे सदग्रंथों में ही लिखा गया है।

हम मूलरूप में सर्वसुख विधि को, सर्वशुभ विधि को अनुसंधान करने में तत्पर हुए। मैं अपने को सफल होने की स्वीकार स्थिति में आ गया। यह तभी घटित हुई जब अभ्यास, चिन्तन क्रम में सम्पूर्ण सह-अस्तित्व ही जानने-मानने में आ गई। अस्तित्व में मानव अविभाज्य रूप में होना जानने-मानने में आई। इसी के साथ-साथ इन-इनका निश्चित कार्य क्यों, कैसा का उत्तर निष्पन्न हुई। हर मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में वर्तमान होना जानने मानने में आई। इसी के साथ अनुसंधान का फलन रूप स्वीकारने के स्थिति में आये। उसके तुरंत बाद ही इसे मानव में अर्पित करने की विधि को पहचानने की प्रक्रिया हुई। शनै:-शनै: इस कार्य में हम प्रवृत्त हुए। इस तथ्य को हम पहचानने में सफल हुए कि अनुभवमूलक विधि से मानव कुल को परंपरा के रूप में व्यक्त होने की आवश्यकता है और यह मानव में सफल होने के लिए सभी तथ्य से पूर्ण है।

भय मुक्ति की अभिलाषा मानव कुल में सदा सदा से रहा है। इसे ऐसे परीक्षण किया जा सकता है हर आयु वर्ग का आदमी भय नहीं स्वीकारता है चाहे शिशु हो, चाहे कौमार्य हो, चाहे नर हो, चाहे नारी हो, सबको भय मुक्ति चाहिये। यह भी साथ में देखा गया कि दूसरे को सब भयभीत कराते भी हैं। इस विधि से मानव कुछ असमंजस सा दिखाई पड़ता है। असमंजसता का मतलब यही है स्वयं चाहता न हो दूसरे के लिए तैयार कर प्रस्तुत कर देता है जैसे सामरिक तंत्र और द्रव्य। कोई देश अपने देश के सुरक्षा कर्मियों पर इसका प्रयोग नहीं चाहता पर इसे तैयार करके दूसरे को बेच देते हैं यही असमंजसता है। इसी प्रकार से कोई सज्जन मिलावट का चीज खाना नहीं चाहते किन्तु मिलावट कर बेच देते हैं। असमंजसता यही है। प्रदूषण को कोई मानव झेल नहीं पाता है, किन्तु प्रदूषण पैदा कर देता है। इसी क्रम में मानव औरों से अपशब्दों का प्रयोग कर देता है ये सब असमंजसता की गिनती में आते हैं। मानव अपने आप में शान्त, निश्चित, अभयशील, रहना ही चाहता है।

भय, प्रलोभन का दूसरा पहलू है। प्रलोभन को मानव स्वीकार लेता है। भय को नहीं चाहता है इसी क्रम में मर्यादा भंग होना पाया जाता है। फलस्वरूप मानव की परस्परता में विरोधाभास तैयार हो जाता है ऐसा विरोधाभास गहराने से मानव का सूझ-बूझ, देख-रेख, भाव-भंगिमा बदल जाती है सशंकित हो जाता है, सशंकित होना ही सुरक्षा में खतरा है। अभी तक हम इसी प्रकार संकट को झेलते रहे हैं। - आ.व. 213-215

(*इस ढंग से आदर्शवादी) विचारों में से कोई समाधान प्रतिपादित नहीं होती अपितु समाधान के विपरीत समस्याओं का संकट ही हर विचार और कार्यक्रमों के परिणाम में देखने को मिलता है। इसलिये संसार को दुख रूप मानते ही

Page 292 of 335