आये हैं। इससे यह सुस्पष्ट हुआ कि जो कुछ भी अभी तक वाङ्मय, पावन ग्रन्थों से सामान्य ग्रन्थों तक रचित हुआ है यह सब चित्रण मूलक प्रकाशन ही है। इस क्रम में यह भी स्पष्ट हो गया है कि समाधि और समाधिस्थ व्यक्ति के आधार पर कोई स्वस्थ परिवार ही नहीं बन पाया है, समाज तो बहुत दूर है। साधनारत व्यक्ति भी साधना काल में परिवार, समाज अथवा व्यवस्था का भागीदार होना संभव नहीं होता। इस प्रकार से साधनारत समय में एवं साधना सफल होने के उपरान्त विचार शून्यता को ही ज्ञानी होने का एक मात्र उपाय प्रकारान्तर से सभी धर्म वाले बताते हैं। वह मानव उपयोगी होना देखने को नहीं मिला।

इसी घटना के साथ जुड़ी हुई और घटना तैयार हुई-स्वर्ग के लिये अनुकूल कार्यकलापों को मानव कर सकता है। इसके लिये ईश्वरीय नियमों-कानूनों को बताया गया। हर जाति, हर वर्ण, हर आश्रम जो नियम-कानून, धर्म ग्रन्थों में लिखी हुई है उसको पालन करना ही स्वर्ग में जाने के लिये एक मात्र उपाय बताये हैं। ऐसे नियम कानूनों को पालन करना ही पुण्य कर्म बताया गया। ऐसे नियम कानून विभिन्न प्रकार से धर्म कहलाने वालों के पुस्तिका में विभिन्न प्रकार से सूत्रित, व्याख्यायित हुई। जो जिस जाति धर्म के नियम कानून रूपी (ईश्वरीय नियम कानून रूपी) कार्यकलापों को पालन करता है उन्हीं-उन्हीं को स्वर्ग मिलने का स्वीकृति हो पाती है। अन्य प्रकार के धर्म वालों को वह स्वर्ग मिल नहीं सकती है। ऐसा हर सामुदायिक धर्म वाले जो अनुसरण करते हैं और जो आर्षेय ग्रंथों का अनुमोदन करते हैं ये सब कहते भी हैं, मानते भी हैं। उल्लेखनीय घटना यही है विविध समुदाय, विभिन्न पवित्र ग्रन्थों के आधार पर मान्यताओं को सुदृढ़ किये रहते हैं। ऊपर कहे गये अस्मिता को भी बनाये रखते हैं। इसके बावजूद ऐसा कोई एक आचरण सार्वभौम होना प्रमाणित नहीं हो पाया, जिसको सभी धर्म वाले स्वीकार लिये हों। इसलिये आदिकाल से अभी तक परस्पर समुदायों में अपना-पराया का दीवाल, प्रत्येक परिवार की परस्परता में अपना-पराया का दीवाल, प्रत्येक व्यक्ति की परस्परता में अपना-पराया का दीवाल बना ही रहता है। - आ.व. 155-156

(B) भौतिकवाद के अनुसार

(*भौतिकवादी मानसिकता में) उपभोक्तावादी विचार स्वयं संग्रह की ओर है और सुविधा उसका लक्ष्य बना रहता है। सम्पूर्ण सुविधाएँ इन्द्रिय सन्निकर्ष में व्याख्यायित हैं। इसे भोगवाद के लिये आधार रूप में पहचानने सर्वोपरि उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया। कर ही रहे हैं। ऐसे उपभोक्ता संस्कृति में अच्छे से अच्छे मकान, अच्छे से अच्छे गाड़ी, अच्छे से अच्छे वस्तु, आभूषण अथवा प्रसाधन और अलंकार विधियाँ गण्य हैं। उन्मुक्त विचारों और प्रवृत्तियों के लिये अनुकूल स्थलियों का भी परिकल्पनाएँ हैं। यही एक परिवार की सीमा में शयनागार, प्रसाधनागार और आहार स्थली (भोजनागार) के रूप में पहचाना गया है। इसकी साज सजावट रचना उपयोग भंगिमाओं पर चर्चायें उन्नतशील विधि से होती ही रहती हैं। ऐसे प्रवृत्तियों में पले हुए व्यक्तियों को देखने पर सर्वेक्षण करने पर यही दिखाई पड़ता है। इनमें से सर्वाधिक लोग उत्पादन से जुड़े हुए नहीं हैं। सम्पूर्ण वैज्ञानिक आवाजों का बुलंद होने के क्रम में प्रौद्योगिकियों की स्थापना और उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन जोर शोर विधि से देखने को, सुनने को मिलती ही रहती है। इन आवाजों में जोर शोर से यही कहा जाता है हर वस्तु आप जो चाहेंगे वह सब डब्बा में बंद होकर आपके घर पहुँचेंगे। उसके भरपायी में हर उपभोक्ता को मुद्रा भर देना है आपको कुछ करना नहीं है।

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