जीवन परमाणु का जागृत होना (क्रियापूर्णता) परमाणु में विकास का दूसरा चरण है और इस जागृति को मानव परंपरा में प्रमाणित करना (आचरणपूर्णता) अंतिम चरण है। भौतिक, रासायनिक विकासक्रम में मानव शरीर तथा परमाणु में विकास पूर्वक जीवन और जीवन जागृति को प्रमाणित करने के क्रम में ही मानव परंपरा में जागृति को प्रमाणित करना होता है। जागृति के प्रमाण का मतलब ही है न्यायपूर्वक, समाधानपूर्वक, यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता पूर्वक प्रमाणित होना। प्रमाणित होने का मतलब परम्परा में होना ही है। उक्त पाँचों विधाएं प्रमाणित होने के क्रम में पीढ़ी से पीढ़ी प्रमाणित होना स्वाभाविक है, यही जागृत परम्परा है।
इस प्रकार गठनपूर्णता, क्रियापूर्णता, आचरणपूर्णता इन तीनों चरणों में परमाणु में विकास व जागृति पूरा होता है। परमाणु में विकास का अर्थ यही है। – क.द. 67-69
(G) अस्तित्व स्थिर है, विकास और जागृति निश्चित है
सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व स्थिर है। सहअस्तित्व में ही विकास और जागृति निश्चित है। इस धरती पर हम मानव इस तथ्य का अध्ययन करने योग्य स्थिति में हो चुके हैं। शुभ का दृष्टा, कर्त्ता, भोक्ता, उसके मूल में शिक्षा संस्कार से पाया गया ज्ञान, विज्ञान, विवेक का धारक-वाहक केवल जागृत मानव ही है। ये तथ्य अपने को भली प्रकार से समझ में आता है। सहअस्तित्ववादी दर्शन, ज्ञान, विज्ञान, विवेक पूर्वक ही हर मानव सर्वशुभ घटनाक्रम में अपने को व्यवस्था सहज रूप में प्रमाणित करते हुए, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना बन जाता है। यही सर्व शुभ कार्यक्रम का पहुँच और प्रगट रूप है। इसके लिये अर्थात् सार्वभौम ज्ञान, विज्ञान, विवेक के लिये अध्ययन ही मात्र एक स्रोत है। ज्ञान, विज्ञान का स्वरूप अपने में सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, चैतन्य प्रकृति रूपी जीवन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण रूपी क्रिया व्यवहार ज्ञान और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने का ज्ञान ही सम्पूर्ण ज्ञान है। इनमें से सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व को चार अवस्थाओं में और चार पदों में अध्ययन करना बन पाता है। इसका मूल स्वरूप व्यापक वस्तु में सम्पूर्ण एक-एक वस्तुओं का डूबा, भीगा, घिरा रहना ही है। यही सहअस्तित्व रूपी नित्य स्वरूप है। यह अपने में घटना-बढ़ना होता ही नहीं, फैलना सिकुड़ना होता ही नहीं, हर हाल में होना ही बना रहता है। इकाइयों की परस्परता में, निश्चित अच्छी दूरियों में, हर इकाइयों में स्वभाव गति प्रमाणित होने की व्यवस्था है ही। क्योंकि, हर परमाणु अंश दूसरे परमाणु अंशों को पहचानने की स्थिति में ही परमाणु गठन के फलन में निश्चित आचरण चरितार्थ होता हुआ समझ में आया है। निश्चित आचरण का ही स्वभाव-गति नाम है। इसलिये स्वभाव गति प्रतिष्ठा में ही हर इकाई अथवा संपूर्ण इकाइयाँ त्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता हुआ देखने, समझने में आता है। स्वयं के अध्ययन से भी यही स्थिति उद्घाटित होती है। इस अर्थ में विकास और जागृति निश्चित है।
हम मानव जागृति पूर्वक स्वभाव गति में ही अर्थात् स्वभाव गति सम्पन्नता के उपरान्त ही, मानवत्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने की प्रवृत्ति होती है। ऐसी स्वभाव गति, जागृति के उपरान्त ही होना पायी जाती है। जागृति तभी प्रमाणित होती है, जब मानव समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी सम्पन्न हो जाता है, फलत: भागीदारी पूर्वक अपने महिमा, यथा स्थिति को प्रमाणित करता है। दूसरे क्रम में यह भी समझ में आया कि मानव ही समझदार होने योग्य है। मानव स्थिरता, निश्चयता को समझने के उपरान्त ही स्वयं निश्चयता और स्थिरता के लिये ईमानदार