(F) जीवन जागृति

चैतन्य परमाणु में -

श्रम के विश्राम रूप में क्रिया पूर्णता है।

गति के गंतव्य रूप में आचरण पूर्णता है। - भ.व. 49, 51, 77

“जीवन में ही दसों क्रियाओं का व्यक्त होना जागृति है। निर्भ्रान्ति स्वरूप ”

(*पूर्व में स्पष्ट हो चुका है कि) परमाणु में विकास के चलते गठनपूर्णता एक संक्रमण घटना रही। संक्रमणीयता का तात्पर्य पुन: पूर्व स्थिति में न आने वाला। परिणाम से मुक्ति का तात्पर्य परमाणु में से कुछ अंश घटने, बढ़ने की घटना से मुक्ति।

सहअस्तित्ववादी विधि से शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में मानव परम्परा वैभवित है। जीवन जागृति ही मन:स्वस्थता का प्रमाण है। जीवन में ही सम्पादित होने वाली, वैभवित होने वाली, अनुभव मूलक विधि से, अनुभवों का बोध बुद्घि में, चिंतन चित्त में, न्याय धर्म सत्य पूर्वक समुचित तुलन क्रिया वृत्ति में (विचरण क्रिया) और मूल्यों का आस्वादन क्रिया मन में होना पाया जाता है। मूल्यों का आस्वादन क्रिया पूर्वक कार्य-व्यवहार तभी सम्भव है जब सम्बन्धों का पहचान स्वीकार्य रहता है। सम्बन्धों को पहचानने के उपरांत ही मूल्यों का निर्वाह कर पाता है।

संबंधों के साथ मूल्य, मूल्यों के साथ वस्तुओं का अर्पण-समर्पण, वस्तुओं के अर्पण-समर्पण के साथ उपयोगिता, सदुपयोगिता, प्रयोजनशीलता प्रमाणित होता हुआ अर्थात् वैभवित होता हुआ पाया जाता है। यही परमाणु में विकास और जागृति का तात्पर्य है। केवल मानव ही जागृति का प्रमाण प्रस्तुत करने योग्य इकाई है। – क.द. 67-96

जागृत जीवन संचेतना अर्थात् संज्ञानीयता में नियंत्रित संवेदनायें प्रकाशित होने वाला अनुभव बल ही बोधपूर्वक विचार शैली में, विचार शैली जीने की कला के रूप में परावर्तित होता है। संचेतना में पाँचों अक्षय बल तथा शक्तियाँ निरन्तर कार्यरत रहती हैं। संचेतना शरीर के माध्यम से प्रकाशमान होने मात्र से शरीर जीवन नहीं होता। संचेतना की अभिव्यक्ति प्रत्येक मानव में होती है। संचेतना पहचानने व निर्वाह करने के रूप में परिलक्षित है। पहचानने तथा निर्वाह करने के क्रम में ही जागृति के क्रम में अर्थात् अस्तित्व और विकास को पहचानना बुनियादी आवश्यकता है। जागृति, विकास की परम अवस्था है। परमाणु में विकास होने की व्यवस्था है। जागृति का तात्पर्य अस्तित्व में अनुभूत होना ही है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति का सत्ता में अनुभूत होना ही अस्तित्व का उद्देश्य है। इस को समझने पर ही विकास की यात्रा भी समझ में आती है।

अस्तित्व के संबंध में जितना भ्रमित रहेंगे उतना ही लक्ष्य के संबध में भ्रमित रहेंगे। इसी को दूसरी प्रकार से देखें तो अस्तित्व में निर्भ्रमता ही लक्ष्य के प्रति निर्भ्रम होने का आधार है। इस प्रकार अस्तित्व, लक्ष्य और विकास के संबंध में निर्भ्रम हो जाना ही विवेक और विज्ञान का प्रयोजन है। इस क्रम में यह स्पष्ट हो जाता है कि सत्ता में संपृक्त प्रकृति का सत्ता में अनुभूत होने पर्यन्त विकास के लिए बाध्य होना ''अस्तित्व सिद्घ सत्य” हुआ। यह स्वयं जड़-चैतन्यात्मक

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