के संकट वश प्रताड़ित है। इसी तरह शरीर को जीवन समझने का भ्रम समस्याओं का कारण बनना और बाह्य प्रताड़ना वश मानव व्याकुल एवं संकट ग्रस्त रहता है। इसका प्रभाव द्रोह, शोषण, युद्ध सदा-सदा से मानव कुल के सिर पर ही नाच रहा है। अथवा मानव इसे अपरिहार्य मान चुका है। इससे घटिया तस्वीर मानव कुल का क्या हो सकता है यह सोचने का बिन्दु है। जबकि मानव इसे ही शान मानता रहा है। - क.द. (2004) 215-216
जीवन में आशा बंधन के उपरान्त विचार बंधन, इच्छा बंधन बलवती होते हुए मानव शरीर द्वारा कर्म स्वतंत्रता, कल्पनाशीलता, क्रियाशीलता, क्रियाकलाप क्रम उसके परिणाम में आंकलन होना, फलत: जागृतिक्रम परंपरा के रूप में मानव प्रतिष्ठा होना, इसी कर्म स्वतंत्रता-कल्पनाशीलता और जागृतिक्रम प्रणालीवश (क्योंकि यह नियति क्रम है) अव्यवस्था का भास-आभास में पीड़ा होना स्वाभाविक रहा।
जीवन ही जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम में गुजरता हुआ जागृत पद में क्रियापूर्णता, जिसका प्रमाण में मानव, स्वायत्त मानव, परिवार मानव, व्यवस्था मानव के रूप में स्वयं में व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण उसमें पारंगत विधिपूर्ण शिक्षा-संस्कार, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था और मानवीय आचार संहिता रूपी संविधान का अध्ययन सहज है। - अ.श. 209,210
(*जागृतिक्रम पर शेष वर्णन, अध्याय -३/ 3.3- ‘जीवन क्रिया में जागृतिक्रम’ के अनतर्गत किया गया है)