और सुखी होने की स्थिति स्पष्ट हो जाती है, फलस्वरूप समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व प्रभावित होने का सौभाग्य उदय होता है, यही मुख्य बिन्दु है।
सर्वशुभ का प्रमाण भी यही है क्योंकि समाधान, समृद्घि पूर्वक ही मानव सुख, शान्ति का अनुभव करता है। इसी क्रम में समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक आनन्द अपने आप में सम्पूर्ण होना पाया जाता है। इस ढंग से मानव लक्ष्य सार्थक होने की स्थिति में जीवन लक्ष्य (सुख, शांति, संतोष, आनन्द) सार्थक होता ही है। जीवन लक्ष्य और मानव लक्ष्य सार्थक होना ही अध्ययन और अध्यापन की सार्वभौमता है। ऐसे लक्ष्य के साथ, मानव परम्परा अपने आप में स्वयं को पहचानने और सम्पूर्ण मानव को पहचानने का सूत्र और व्याख्या बन जाता है। प्रमाण के रूप में व्याख्या, समझ के रूप में सूत्र होना पाया जाता है। यह नियति सहज विधि से समीचीन रहना पाया जाता है। नियति विधि का तात्पर्य विकासक्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति है। दूसरे विधि से भौतिक, रासायनिक रचना शरीर और जीवन क्रियाकलाप का संयुक्त अभिव्यक्ति, सम्प्रेषणा, प्रकाशन के रूप में है।
मानव लक्ष्य - समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व को प्रमाणित करने और उस आधार पर जीवन लक्ष्य (मन:स्वस्थता) - सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द को सार्थक बनाने के अर्थ में मानव शिक्षा संस्कार की आवश्यकता सदा-सदा से बनी हुई है। इसकी सफलता ही मानव कुल का सौभाग्य है।- क.द. 69-72
(J) अस्तित्व में ‘परमाणु में विकास’- सारांश
परमाणु में विकास
अस्तित्व को अनादि काल से मानव स्पष्ट और प्रमाण रूप में समझने का प्रयास करता रहा है। इसी क्रम में अधिभौतिकवादी विचारों के अनुसार चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति होती है ऐसा माना जाता है।
भौतिकवादी विचारों के अनुसार पदार्थ से चेतना निष्पन्न होती है।
ये दोनों विचारधारायें अपने-अपने समर्थन के लिए अनेकानेक तर्कों, अभ्यासों और प्रयोगों को प्रस्तावित करते रहे। अभी तक न तो किसी ने चेतना से पदार्थ को पैदा होते हुए देखा तथा न ही पदार्थ से चेतना पैदा होते हुए देखने को मिला। यही देखने को मिलता है कि चेतना व पदार्थ अविभाज्य वर्तमान है। इसके मूल रूप को देखने से पता चलता है कि सत्ता (चेतना) में सम्पृक्त प्रकृति (पदार्थ) ही अस्तित्व सर्वस्व है। यहाँ देखने का तात्पर्य समझने से है। सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अविभाज्य वर्तमान होने के कारण अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व के रूप में नित्य प्रकाशित है। इस तथ्य को हृदयंगम करने पर स्पष्ट हो जाता है कि चेतना और पदार्थ में नित्य सामरस्यता त्रिकालाबाध सत्य है।
सत्ता अरूप है, व्यापक है और सत्ता में प्रकृति रूप गुण स्वभाव धर्म सम्पन्न है और अविभाज्य है। सत्ता को ‘शून्य’ नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कोई स्थान ही नहीं जहाँ सत्ता न हो, इसलिए प्रकृति का सत्ता में होना स्वाभाविक है। सत्ता को साम्य ऊर्जा, शून्य, ज्ञान, चेतना, व्यापक, नित्य, ईश्वर और निरपेक्ष ऊर्जा के नाम से भी जाना जाता है। सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अनन्त इकाइयों के रूप में है। प्रत्येक इकाई सत्ता में सम्पृक्त होने के कारण सत्ता में घिरी हुई, डूबी हुई और भीगी हुई है।