हो पाता है, जिम्मेदार हो पाता है। फलस्वरूप भागीदारी पूर्वक प्रमाणित हो पाता है। इसलिये मानव को समझदार होना आवश्यक है इसकी अपेक्षा अर्थात् समझदारी की अपेक्षा सर्वमानव में होना पाया जाता है।

(H) ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय

सह-अस्तित्व वादी सोच के अनुसार ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय को ठीक-ठीक अध्ययन किया जा सकता है। ज्ञाता के रुप में जीवन को, ज्ञान के रुप में सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान; जीवन ज्ञान; मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान को पहचाना गया। जागृति पूर्वक मानवाकाँक्षा, जीवनकाँक्षा को सार्थक बनाना ज्ञेय का तात्पर्य है, अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था पूर्वक मानव लक्ष्य, जीवन लक्ष्य को प्रमाणित करना है, यही ज्ञेय के सार्थक होने का प्रमाण है।

इसी प्रकार दृष्टा, दृश्य, दर्शन की भी सार्थक व्याख्या हो पाती है। दृष्टा पद में जीवन, दृश्य पद में सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व, दर्शन के अर्थ में अस्तित्व दर्शन के रूप में सार्थक व्याख्या होना हो जाता है।

ध्यान, ध्याता, ध्येय भी इसी क्रम में स्पष्ट होता है। ध्येय जागृति के रूप में, ध्यान समझदारी से सम्पन्न होने; समझदारी को प्रमाणित करने के क्रम के रूप में, ध्याता जीवन के रूप में पहचानने की व्यवस्था है।

कर्त्ता, कार्य, कारण भी स्पष्ट है। कर्त्ता पद में जीवन, कार्य पद में मानव; देव मानव; दिव्य मानव पद-प्रतिष्ठा, कारण के रूप में सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व नित्य प्रतिष्ठा है।

साध्य, साधन, साधक के रूप में जो सोचा जाता था, सहअस्तित्ववादी नजरिये से साधक को पहचानने का तरीका बहुत आसान, प्रयोजन से जुड़ा हुआ होना पाया जाता है। सहअस्तित्ववादी नजरिये से साधक मानव के रूप में पहचानने में आता है। साध्य के रूप में जीवन जागृति सुलभ हो पाता है। मानव स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार के रूप में जागृति ही पहचानने में आता है। ऐसे स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार, समझदारी के रूप में और ऐसी समझदारी ज्ञान, विज्ञान, विवेक रूप में पुनः स्वत्व, स्वतंत्रता, अधिकार वैभवित होना पाया जाता है। यही जागृति का प्रमाण है। इस प्रकार साध्य कितना सार्थक है अर्थात् जागृति रूपी साध्य कितना सार्थक है, हर व्यक्ति सोच सकता है। साधन के रूप में शोध, अनुसंधान के लिए कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता, परम्परा रूप में प्रमाण, यही साधन है। प्रमाण सम्पन्न परम्परा अर्थात् प्रमाण और प्रामाणिकता के धारक वाहक के रूप में मानव परम्परा जब अपने को प्रमाणित कर पाती है, उसी समझ में सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज का प्रमाण बना ही रहता है।-क.द., 216-217 (2004)

(I) मन:स्वस्थता का स्वरूप

भौतिक, रासायनिक एवं जीवन क्रियाओं के अध्ययन क्रम में मानव का अध्ययन परिपूर्ण होना आवश्यक है। इस मुद्दे पर विगत से अथक प्रयास भी हुआ है। मनुष्य के संदर्भ में, मानवत्व को पहचाने बिना जो अध्ययन किया गया, उसमें भौतिक, रासायनिक क्रियाकलाप का अध्ययन भी अधूरा रह गया। उसी प्रकार भौतिक, रासायनिक क्रियाकलापों का जितना भी अध्ययन हुआ, उसके आधार पर भी मानव को समझना पूरा नहीं हो सका। दोनों प्रकार से इसे ऐसे समझ सकते हैं कि भौतिक, रासायनिक क्रियाकलाप का सूत्र अभी तक मानव को जितना उपलब्ध है, उसके आधार पर मानव का सूत्र और व्याख्या नहीं होता। इसलिए हम मानव, मानव पर विश्वास करने की स्थिति में नहीं पहुँचे।

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