सत्ता व्यापक रूपी किसी लंबाई चौड़ाई में सीमित नहीं है, इसका कोई मापदण्ड नहीं बन पाता, इसलिए सत्ता व्यापक है। प्रकृति रूप में जितनी भी इकाइयाँ है उन सबकी गणना नहीं हो पाती इसलिए वे अनंत हैं इस प्रकार अस्तित्व स्वयं व्यापक और अनन्त है।

सत्ता अरूपात्मक और सत्ता में प्रकृति रूपात्मक अस्तित्व है। अस्तित्व का तात्पर्य होने से और अविनाशिता से है। सत्ता गति और दबाव विहीन स्थिति में है। जबकि सत्ता में ही सम्पूर्ण प्रकृति गति और दबाव सहित विद्यमान है। दबाव अर्थात् वातावरणवश (परस्परतावश) आकर्षण विकर्षण के लिए बाध्यता। सत्ता अरूपात्मक होने के कारण आयामों में सीमित नहीं है जबकि सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अनन्त इकाइयों का समूह है। साथ ही प्रत्येक इकाई आयामों सहित छ: ओर से सीमित है।

प्रकृति की मूल इकाई परमाणु है। क्योंकि परमाणु में ही विकास होता है। प्रत्येक परमाणु गठनपूर्वक परमाणु है। प्रत्येक गठन में एक से अधिक परमाणु अंशों का होना अनिवार्य है। परमाणु के पूर्व रूप(परमाणुअंश) में विकास होता नहीं है। परमाणु के पररूप(अणु) रचनाएँ विकास की लाक्षणिकता को प्रकाशित करते हैं, परन्तु विकास नहीं होता है, क्योंकि विकसित इकाई अर्थात् जीवन शरीर रचना के माध्यम से प्रकाशित और सम्प्रेषित होता है। विकास के क्रम में ही प्रकृति दो वर्ग व चार अवस्थाओं में प्रकाशमान है। प्रकृति के दो वर्ग जड़ और चैतन्य है। प्रकृति की चार अवस्थाएँ पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था है। प्रकृति में पदचक्र और पदमुक्ति का प्रभेद चार प्रकार से है। जैसे- प्राणपद चक्र, भ्रांति पद चक्र, देवपद चक्र और पदमुक्ति (दिव्यपद या पूर्णपद)। इसी क्रम में अस्तित्व में प्रकृति का विकास और उसका इतिहास नित्य समीचीन है।

अस्तित्व में प्रकृति सहज सम्पूर्ण वैविध्यताएँ विकासक्रम में प्रकाशित हैं। यह एक अनवरत क्रिया है। अस्तित्व में विकास क्रम शाश्वत प्रणाली है, क्योंकि अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व होने के कारण परस्पर प्रकृति के आदान-प्रदान एक स्वाभाविक क्रिया है। आदान प्रदान अपनी दोनों स्थितियों में स्वयं व्याख्यायित है। आदान-प्रदान के अनन्तर तुष्टि अथवा स्वभावगति का होना पाया जाता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि जिस इकाई में आदान होता है उसके उपरान्त स्वभाव गति होती ही है, साथ ही प्रदान जिससे होता है, उसके उपरान्त उसमें भी स्वभाव गति होती है। इस विधि से सह-अस्तित्व प्रमाणित होता है।

प्रकृति में वैविध्यता है। वैविध्यता का मूल रूप पदार्थ में अथवा प्रकृति में अनेक स्थितियाँ हैं। प्रकृति में अनेक स्थितियाँ विकास के क्रम में हैं। अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व होने के कारण प्रकृति की प्रत्येक इकाई की परस्परता में सह-अस्तित्व का सूत्र समाया है। (क्योंकि प्रकृति की अनन्त इकाइयाँ परस्परता में आदान-प्रदान रत हैं।) सह-अस्तित्व ही पूरकता का सूत्र व स्वरूप है। पूरकता विकास के अर्थ में सार्थक होती है। अस्तित्व में विकास एक अनवरत स्थिति है। विकास के क्रम में अनेक पद और स्थितियाँ अस्तित्व में देखने को मिलती हैं। प्रकृति, पदार्थ के नाम से भी अभिहित होती है। पदार्थ का तात्पर्य है कि पदभेद से अर्थभेद को प्रकाशित कर सके अथवा पदभेद से अर्थभेद को प्रकाशित करने वाली वस्तुओं से है। वस्तु का तात्पर्य वास्तविकताओं को प्रकाशित करने योग्य क्षमता सम्पन्नता से है। इस प्रकार प्रकृति में वस्तु और पदार्थ की अवधारणा स्पष्ट हो जाती है।

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