दूसरी विधि से ऐसा होना संभव नहीं है। सत्ता न हो, ऐसे स्थान पर प्रकृति को पाना संभव नहीं है। कहीं भी पाएंगे तो सत्तामयता में सम्पूर्ण प्रकृति ओत-प्रोत है - यही “सह-अस्तित्व’’ का मूल रूप है। सह-अस्तित्व, अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान है और इसका वैभव है। अस्तित्व सहज रूप में दृष्टा पद में स्थित मनुष्य को यह पता लगता है कि सत्तामयता स्थितिपूर्ण है। सत्तामयता में स्थित सम्पूर्ण प्रकृति स्थितिशील है। “स्थितिपूर्ण’’ का तात्पर्य निरंतर महिमा संपन्नता से है। परम महिमा यही है कि प्रकृति में दिखने वाले सम्पूर्ण बल का नियंत्रण और संरक्षण, स्वरूप में बोधगम्य (ज्ञातव्य) है। सत्तामयता का अर्थ निरपेक्ष ऊर्जा और परम बल सहज रूप में नित्य वैभवित रहने से है।
परमाणु
स्थितिशीलता का तात्पर्य सत्तामयता में संपृक्तता से है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति सहअस्तित्व रूप में नित्य प्रमाणित होने से है, सत्तामयता में सम्पूर्ण प्रकृति ओत-प्रोत रहने से है। स्थितिपूर्ण सत्तामयता में ऊर्जा संपन्न, बल संपन्न प्रकृति पूर्णता में, से, के लिए बीज संपन्न होने से है। क्योंकि स्थिति पूर्ण सत्ता में संपृक्ततावश, पूर्णता की दिशा सम्पन्नता से है। प्रत्येक वस्तु में दिशा सम्पन्नता स्पष्ट है। ऐसी स्पष्टता को इस प्रकार देखा जा सकता है कि सम्पूर्ण वस्तु परमाणु के रूप में क्रियाशील है। क्रिया अपने में श्रम, गति, परिणाम का अविरत कार्य है ऐसा दिखाई पड़ता है। श्रम, गति, परिणाम संपन्न परमाणु में ही, पूर्णता सहज दिशा स्पष्ट है। यथा प्रत्येक इकाई अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण है। हर वस्तु अपनी संपूर्णता के साथ त्व संपन्न वर्तमान है। यह पदार्थ व प्राण अवस्था है। यह विकास क्रम सहज रूप है। यही भौतिक-रासायनिक क्रियाकलाप है। विकास भी परमाणु में ही सम्पन्न होता है। विकसित परमाणु जीवन पद में है।
परमाणु में ही श्रम, गति, परिणाम व्याख्यायित है। परिणाम का अमरत्व ही परमाणु में विकास की मंजिल है। रासायनिक द्रव्यों से रचित समृद्घिपूर्ण मेधसयुक्त शरीर व जीवन के संयुक्त रूप में मानव है। गर्भाशय में शरीर रचना का होना स्पष्ट है। जीवन विकसित परमाणु, चैतन्य इकाई के रूप में अस्तित्व में रहता ही है। मानव परम्परा में शरीर के साथ जीवन का संयोजन जागृति पूर्णता के अर्थ में है, यही श्रम का विश्राम, गति का गंतव्य के रूप में प्रमाण है। परिणाम का अमरत्व, श्रम का विश्राम, गति का गंतव्य ही दिशा है। इसे प्रत्येक मनुष्य समझने में समर्थ है। यही मुख्य तथ्य है। मानव संचेतना को, समझने समझाने का आधार एवं प्रक्रिया है। मनुष्य ही अस्तित्व में दृष्टा है। इस साक्ष्य को आगे संदर्भानुसार स्पष्ट किया है। इसके पहले प्रत्येक मनुष्य, कल्पनाशील कर्म स्वतंत्र है - यह बात चर्चा में आ चुकी है। ऐसी कल्पनाशीलता की महिमावश ही अस्तित्व में अध्ययन का साहस जुटा पाता है। इसी क्रम में प्रत्येक प्रजाति के वस्तु का अपनी परमाणविक स्थिति में क्रियाशील होना पाया जाता है। परमाणु में ही, श्रम, गति, परिणाम व्याख्यायित होता है और परमाणु ही “परिणाम का अमरत्ववश’’ जीवन पद में संक्रमित है। परिणाम के अमरत्व के मूल में गठन पूर्णता ही प्रधान प्रक्रिया है। यह अस्तित्व सहज घटना है।
अस्तित्व ही नित्य वर्तमान और परम सत्य है। इस प्रकार सत्य में, से, के लिए ही विकास क्रम, विकास व जागृति सहज अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन है। अस्तित्व अपने स्वरूप में सर्व-देश, सर्वकाल, सर्ववस्तु ही है। वस्तु का तात्पर्य वास्तविकताओं को प्रकाशित करता हुआ प्रमाण से है। सर्वदेश का तात्पर्य मूलत: सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति है। रचना सम्पन्न प्रकृति में ही देश चिन्हित होता है। सत्तामयता, को सर्वदेश इसीलिए कहना बनता है कि सम्पूर्ण प्रकृति का सत्तामयता में नियंत्रित, संरक्षित, ऊर्जा संपन्न और क्रियाशील होना वर्तमान में दिखाई पड़ता है। सम्पूर्ण प्रकृति की