स्थिति-गति सत्ता में ही है। आवास को देश कहें तब सत्तामयता ही मूलत: देश के रूप में प्रमाणित है। रचना की अवधि रूपी विस्तार को देखने की स्थिति में सम्पूर्ण रासायनिक, भौतिक रचनाएं, सीमित देश के रूप में हैं। इस प्रकार भी व्यापक सत्ता में परिमित (सीमित, विभक्त) वस्तुएं नित्य वर्तमान हैं, यह समझ में आता है। इस प्रकार प्रकृति परिमित (सीमित), सत्ता अपरिमित (व्यापक) वस्तु देश के रूप में अस्तित्व में स्पष्ट है।

परिमित वस्तुओं में देश विभाजन रेखा होना मान लिया जाता है, होता नहीं। जबकि व्यापक सत्ता में देश विभाजन रेखा बनती नहीं अथवा चिन्हित नहीं होती। इसे कोई भी, प्रयोग कर देख सकता है। इसका मूल तथ्य यही है - (१) सत्तामयता का सम्पूर्ण प्रकृति में पारगामी होना। (२) सत्तामयता का पारदर्शी होना। (३) व्यापक होना। परिमित वस्तुओं में विभाजन रेखाओं को मान लिया जाता है। ऐसा हुआ नहीं रहता। जैसे इस धरती पर, अनेक देशों के नाम से भूखंडों का सीमाकरण आदमी करता है। इसी के साथ यह भी देखा जाता है कि वह सीमाएं धरती से विखंडित न होकर अखंड रहती हैं। यह धरती अपने वातावरण सहित संपूर्णता सम्पन्न इकाई है। सम्पूर्णता अपने में अखण्ड है। यह अखंडता निरंतर बनी ही रहती है। जब तक धरती अपनी स्थिति को बनाए रख पाती है। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि यह धरती अपने में समृद्घि और संतुलन संपन्न होने के फलस्वरूप, मानव के भी वैभव आवास योग्य हुई है। इसका साक्ष्य इस धरती पर मानव का होना ही है। इससे यह पता चलता है कि इस धरती की सहज सटीकता का अध्ययन करना भी एक अनिवार्य स्थिति है।

यह धरती अस्तित्व में अविभाज्य है और अनेक सौर-व्यूहों में से, एक सौर-व्यूह के अंगभूत रूप में वैभवित है। इसी धरती पर मानव अपने को नैसर्गिकता सहित सुरक्षित रहना पाते ही आया। फलस्वरूप मानव अपनी कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रतावश सामुदायिक, आर्थिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी को प्रयोग करते ही आया। ऐसे सभी प्रयोगों के फलस्वरूप, संतुलित नैसर्गिकता से, असंतुलित नैसर्गिकता की ओर गति स्पष्ट हुई। इस धरती के अधिकांश मानव, ऐसे परिवर्तन से व्याकुल हुए, ऐसा सुनने को मिलता है। इसका मूल तत्व, मानव संचेतना विरोधी मानसिकता ही प्रधान कारण और कार्य रहा है। मानव का अध्ययन जिस प्रकार से अभी तक संपन्न हुआ, उसी के आधार पर मानव संचेतना विरोधी मानसिकता (संवेदनशील मानसिकता) को प्रोत्साहन मिला, जबकि संज्ञानशीलता के नियंत्रण में, संदवेनशीलता को पहचानने की आवश्यकता रही। यह विफल रहा अतएव परिणाम नकारात्मक, मानव विरोधी रूप में प्रवर्तित हुआ। इस प्रकार मानवत्व सहित ही मानव संचेतना है। इसी प्रकार देव संचेतना, दिव्य संचेतना प्रकट होना सहज है।

मानव का सम्पूर्ण अध्ययन मध्यस्थ दर्शन में सपन्न किया गया। अस्तित्व दर्शन के आधार पर यथा पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था की सहज स्थितियों का अध्ययन किया गया। इसी क्रम में अस्तित्व में, ज्ञानावस्था में मनुष्य को पहचाना गया। ज्ञानावस्था का तात्पर्य दृष्टा पद प्रतिष्ठा में कर्ता, भोक्ता और पुन:दृष्टा के रूप में जीने के कार्यक्रमों सहित अभिव्यक्त, संप्रेषणाशील और प्रकाशित होने से है।

अस्तित्व में “परमाणु में विकास’’ पूरकता, संक्रमण, जीवन, जीवनी क्रम, सकारात्मक समझ, पद्घति, प्रणाली, दिशा की ओर जीने का कार्यक्रम रूपी परिवार मूलक स्वराज्य और स्वानुशासन रूपी स्वतंत्रता को विधिवत अध्ययन किया गया है। साथ ही साथ अस्तित्व में विकास, पूरकता, उदात्तीकरण, भौतिक रासायनिक रचनाओं और विरचनाओं का भी अध्ययन किया गया। इस प्रकार जीवन, जीवन जागृति क्रिया और भौतिक रासायनिक क्रियाओं को सांगोपांग

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