के तैयार होने के कार्यक्रम की परिकल्पना दी गई। यह प्रकृति में वह भी स्वदेज अवस्था में केंचुआ, जोंक आदि रचनाएँ विरचित होकर प्रत्येक मृतक कोषा पुनः उसी प्रकार की रचना के लिए बीज रूप है और इसके साकार होने के प्रमाणों को देखा गया है। जैसे एक जोंक को सुखाकर बुरादा बना लें, उसको किसी नमी के स्थान पर जैसे मिट्टी के बर्तन में पानी भर दें। पानी की नमी धीरे-धीरे बहिर्गत होती रहे। उसे पेंदी से लगा हुआ जोंक का बुरादा डाल दें, कुछ ही दिनों में बहुत से जोंक देखने को मिलते हैं। इसी प्रकार चमड़े की कोषाएँ निष्प्राणित होने के बाद भी सप्राणित होना प्रमाणित हो जाता है। अभी अत्याधुनिक खर्चीली विधियों से इसी को दोहराने का उपक्रम किया गया है। इसमें भी मानव शरीर के एक कोषा को उसमें निहित प्राण सूत्र अथवा रचना सूत्र के आधार पर बहुकोषाओं में प्रवर्तित और रचना सूत्र में स्थापित रचना के रूप में रचित होने के लिए आवश्यकीय रासायनिक द्रव्यों को सुलभ कराने और ऊष्मा व दबाव नियंत्रित कर रखने में मानव सफल हुआ है। फलस्वरूप कृत्रिम शरीर रचना एक संभावना के रूप में आ चुकी है। मूलतः यह प्राकृतिक स्वरूप ही है क्योंकि इस कार्यकलाप में भी किसी शरीर का मूल प्राण कोशाओं का आधार रहता है इसलिए यह भी प्राकृतिक स्वरूप में भी गण्य हो पाता है। इसका उदाहरण पहले दे चुके हैं।

कृत्रिम शरीर रचना की अस्मिता के संबंध में मूल मानसिकता को विश्लेषित करने पर पता लगता है कि किसी एक प्रजाति की शरीर रचना को बहु-संख्या में प्राप्त कर लें, इससे श्रेष्ठ समाज-रचना हो सकती है, इस बात की सूझ-बूझ रंग और नस्ल के आधार पर सोची जा सकती है। सभी रंग और नस्ल भी अभिव्यक्ति की विविधता में और किसी एक ही व्यक्ति में बुहमुखी प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इसके बावजूद अभिलाषाएँ या परिकल्पनाएँ कृत्रिम मानव के सृजन के मूल में एक प्रजाति की कामना का होना संभव है। इसी के साथ अन्य प्रजातियों के शरीर रचना की संख्या को घटाने की भी परिकल्पना हो सकती है। इससे संसार का कोई उपकार होने की संभावना नहीं है क्योंकि मानव संस्कारनुषंगीय इकाई है, सुख धर्मी है और विज्ञान तथा विवेक पूर्ण विधि से जीने की कला में जागृत होना प्रत्याशित, आशित और संभावित तथ्य है।

संस्कार शरीरगत तथ्य न होकर जीवनगत तथ्य है। जीवन में सम्पूर्ण समझदारी का स्थान और प्रणाली है। शरीर में कोई ऐसा अंग, अवयव और इन्द्रियाँ नहीं है जो जीवंतता के अभाव में ज्ञान इन्द्रियों की क्रियाएँ सम्पन्न कर सके। ज्ञानेन्द्रियों में ऐसा कोई स्थान नहीं है जिसमें नियम, न्याय, समाधान, सत्य की प्यास हो। मेधस रचना में ऐसा कोई स्थान नहीं है जो श्रुति और स्मृति का

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