में और परमाणु ही विकास क्रम में अणु, कोशा, रचना व विरचना के क्रम में अस्तित्व में होना पाया जाता है। परमाणु ही व्यवस्था का मूल है। भौतिक क्रियाकलाप, रासायनिक क्रियाकलाप, जीवन क्रियाकलाप के मूल में परमाणु ही व्यवस्था का धारक-वाहक होना पाया जाता है। मनुष्येतर तीनों अवस्थाएँ अपने “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में इस धरती में विद्यमान हैं। मानव भी मानवत्व सहित व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होने के लिए प्रयत्नशील है इसकी संभावना समीचीन है।

सम्पूर्ण श्रु्ति प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही उद्गमशील है। श्रुति को ध्वनि, शब्द, नाद व भाषा के रूप में मानव पहचानता है एवं इसकी सार्थकता को पहचानना शेष रहा। इसी क्रम में गति, लय, तरंग को भी पहचानता है। यह विविध प्रकार से श्रुति को ही वस्तु के रूप में समझने का प्रयास सार्थक होता है। श्रुति का तात्पर्य स्थिति सत्य, वस्तु स्थिति सत्य, वस्तुगत सत्य को इंगित करने, बोध करने के लिए ही सुनने योग्य व सुनाने योग्य संभाषण है। पूर्णता को इंगित करने-कराने के अर्थ में प्रयोग किया गया भाषा एवं परिभाषा है। सुनने-सुनाने के लिए स्वयं स्फूर्त मानव अपेक्षा है। सुनाने योग्य भी स्वयं स्फूर्त संप्रेषणा है। संप्रेषणा का तात्पर्य पूर्णता के अर्थ में प्रस्तुत होने की प्रक्रिया है। सुनने के क्रम में भी पूर्णता को पहचानने सहज अपेक्षाएँ बनी ही रहती हैं। पूर्णता अपने में निरंतर है। इसका सामान्य स्वरूप अस्तित्व में पूर्णता परम्परा के रूप में प्रकाशित है। अस्तित्व में पूर्णता, गठन पूर्णता, क्रिया पूर्णता, आचरण पूर्णता ही है। रासायनिक-भौतिक इकाईयाँ अपने-अपने वातावरण सहित सम्पूर्ण है ही। पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था की परंपराएँ उन-उन की ‘त्व’ सहित व्यवस्था के रूप में सूत्रित व्याख्यायित है। यह परंपराएँ पूर्णता संपूर्णता सहज ही, निरंतरता को प्राप्त किए हैं। वह ‘त्व’ सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी है। यही वैभव सूत्र है।

मानव ऐसी श्रुति परम्परा को चाहता ही है कि इससे यथार्थता, वास्तविकता और सत्यता सहज ही समझ में आये। जीवन सहज जिज्ञासा क्यों है ? कैसा है? कबसे है ? कैसा बना है ? इस प्रकार के प्रश्न अपने आप उदय होते ही हैं। यह कल्पनाशीलता की गरिमा है इसका उत्तर पाना, समाधान पाना, प्रमाण पाना, प्रमाणित होना यह ही श्रुति समुच्चय की सार्थकता में होना पाया गया।

सम्पूर्ण वांङमय अर्थात् श्रुति (सुनने योग्य, सुनाने योग्य, भाषा, परिभाषा जो सोच-विचार, निश्चय और समझदारी प्रवर्तन भाषाकरण सूत्रीकरण, वाक्य प्रबंधन, संवाद के रूप में प्रचलित

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