में अनुभव अर्थात् जानने-मानने के तृप्ति बिंदु अभिव्यक्ति सहित रूप में प्रमाणित है। इस प्रकार जीवन जागृति का स्रोत, प्रक्रिया, प्रयोजन स्पष्ट है। सत्य, धर्म, न्याय सहज अभिव्यक्ति मानव परम्परा में, से, के लिए परम आवश्यक है। इसी सत्यतावश अवसर समीचीन है।
न्याय सम्मत चयन, आस्वादन, विश्लेषण, इंद्रिय कार्यकलाप नियम नियंत्रण के रूप में स्वास्थ्य वस्तुओं का आवश्यकता से अधिक उत्पादन, आवर्तनशील आर्थिक कार्य व्यवहार न्याय संगत होने के उपरान्त ही जागृति सहज विधि से समाधान समृद्धि सम्पन्न होता है। न्याय सम्मत आचरण (जो स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार के रूप में है), तन-मन-धन रूपी अर्थ का सदुपयोग एवं सुरक्षा सभी संबंधों की पहचान एवं मूल्यों का निर्वाह ही मूल्य, चरित्र, नैतिकता रूपी आचरण वैभव है। यही सार्वभौम मानव है तथा स्वयं में व्यवस्था रूपी जागृत मानव है। ऐसे जागृत मानव ही समग्र व्यवस्था में भागीदार होते हैं।
॥ नित्यम् यातु शुभोदयम् ॥
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