हैं। संदर्भानुसार इन्हीं किन्हीं दो ध्रुवों के साथ संयोजित रूप हर अध्ययनशील मेधावियों को सहज सुलभ होने की कामना से मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद को प्रस्तुत किया है। इसी के अंगभूत मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान शास्त्र प्रस्तुत है।

भाषा मर्यादा के साथ व्यवहार, व्यवस्था और मूल्यांकन मर्यादाओं को सार्थकता के अर्थ में प्रयोजित करने का उद्देश्य समाहित है। इसमें हमारी निष्ठा बनी हुई है। जागृत मानव सार्थक श्रुति परम्परा का स्वागत कर स्वीकार करता है। श्रुति सहज श्रवण से पूर्णता, संपूर्णता, सार्थकता, बोध होता है, स्वयं स्फूर्त सम्प्रेषणाएँ पूर्णता को प्रकाशित संप्रेषित करती है, प्रमाणित करने में तत्परता बनी ही रहती है। ऐसी पूर्णता “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में ही प्रमाणित हो पाता है और समग्र व्यवस्था के रूप में परम्परा हो पाती है। मानव में, से, के लिए सहज रूप में परम्परा मानवत्व सहित परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था स्वानुशासन के रूप में ही है। मानव परम्परा का जागृति सहज परम्परा होना समीचीन है। इस प्रकार श्रुति का प्रयोजन जागृति के अर्थ में सहज सार्थक सार्वभौम रूप में होना स्पष्ट हो जाता है। अस्तु, प्रत्येक मानव अपने में विश्वास कर सके, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान कर सके, प्रतिभा व व्यक्तित्व में संतुलन को अनुभव कर सके; परिवार मूलक स्वराज्य को पहचान सके एवं उनमें भागीदार हो सके अखंड समाज को पहचान सके व उसका निर्वाह कर सके, स्वानुशासन को पहचान सके व निर्वाह कर सके।

स्वयं के प्रति विश्वास एवं श्रेष्ठता के प्रति सम्मान यह मानव में, से, के लिए सहज समीचीन है। समझदारी जीवन का स्वत्व है। ईमानदारी पहचानने व निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होती है। जिम्मेंदारी व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी संबंध होते हैं। यह मानव सहज अध्ययन का आधार है। जागृत जीवन सहज 10 क्रियाएँ शरीर यात्रा पर्यन्त अक्षुण्ण रूप में वर्तमान रहती ही है। इन 10 क्रियाओं में से जब विश्लेषण व तुलन की बात आती है तब तुलन में पहचान में आने वाली प्रिय, हित, लाभ, न्याय, धर्म, सत्य में संयत हो जाती है। जैसे शरीर के साथ न्याय, स्वास्थ्य के साथ संयम के रूप में सार्थक होता है। प्रिय रूपी इन्द्रिय सन्निकर्ष क्रियाकलाप, व्यवहार न्याय के साथ लोक न्याय के साथ संयत हो जाते हैं। लाभ प्रवृत्ति उत्पादन और विनिमय न्याय के साथ सम्पन्न होते हुए समृद्धि के साथ संयत होना पाया जाता है। समृद्धि एक मानव लक्ष्य है। उक्त सभी तथ्यों को समझने वाला मानव समझाने वाला मानव है। न्याय धर्म का सत्योन्मुखी प्रयोजन पूर्ण होना जागृत मानव पंरपरा में ही प्रमाणित होता है। इसके प्रमाण के लिए

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