चित्त
चित्त सहज 16 आचरण
1. श्रुति 2. स्मृति
श्रुति :- (1) यथार्थ जीवन व दर्शन पूर्ण अभिव्यक्ति। (2) यथार्थ जानकारी का भाषाकरण। (3) सहअस्तित्व सहज यथार्थो का भाषा सहज संप्रेषणा, अभिव्यक्ति।
स्मृति :- (1) जाने हुए की आवश्यकतानुसार अभिव्यक्ति। (2) बार-बार आवश्यकतानुसार भाषा पूर्वक जानकारी का प्रस्तुतीकरण। (3) भाषा से इंगित वस्तु को साक्षात्कार सहित चित्रण समेत की गई स्वीकृति जिसको बार-बार दोहराया जाना प्रमाण है।
श्रुति सहअस्तित्व सहज अभिव्यक्ति है। सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व नित्य वर्तमान है। वर्तमान में ही मानव ने अपनी कर्म स्वतंत्रता, कल्पनाशीलता का प्रयोग किया है, कर रहा है, करता रहेगा। मानव में ही श्रुति स्मृति सहज प्रकाशन प्रमाणित होना पाया जाता है। जिससे भास, आभास, प्रतीति पूर्वक अनुभव होना पाया जाता है। इसी कारणवश उसे उसके सहज रूप में समझना कार्यक्रम है। इसका प्रमाण यह है कि मानव ही अस्तित्व में ध्वनि, शब्द, नाद, भाषा व वस्तु सहज प्रभेदों को जानता, मानता, पहचानता है अथवा इसके योग्य है। जैसे पदार्थ अवस्था में पाई जाने वाली व्यवस्था का मूल रूप परमाणु में भी ध्वनि और वस्तु को पहचानता है। फलतः अणुओं के रूप में होना स्वाभाविक है। प्राणकोशाओं में ध्वनि व कार्य संकेतों को परस्पर कोशाएँ पहचानते है फलस्वरूप रचनाएँ संपन्न होती हैं। उसी भांति जीवों में भी शब्द, ध्वनि और नाद उनके परस्पर पहचान में होना पाया जाता है। मानव में शब्द, ध्वनि, नाद व भाषा ये सहज ही परस्पर वस्तुओं को इंगित करने के अर्थ में जानने-मानने, पहचानने को मिलता है। भाषा का तात्पर्य होता है जिससे वस्तु सहज सत्य भास हो जाय। मानव भाषा में सत्य भास, आभास, प्रतीति सहित अनुभव होने के अर्थ में ही प्रयोग किया जाता है। यही जागृति सहज संप्रेषणा है। इसी क्रम में भाषा के प्रति विश्वास हो पाता है। मनुष्येतर प्रकृति में भी अपने-अपने “त्व” सहित व्यवस्था को प्रमाणित करने के क्रम में सम्पूर्ण ध्वनि, नाद व शब्द को देखा जाता है। जागृत मानव परस्पर भाषा द्वारा इंगित होना चाहता है या इंगित कराना चाहता है।
भाषा, ध्वनि, नाद व शब्द के मूल में देखने पर पता चलता है कि इकाई में स्वयं स्फूर्त अभिव्यक्ति है। मूल इकाई का तात्पर्य परमाणु ही है। परमाणु ही विकास पूर्वक जीवन, जीवन जागृति पदों