रहता ही है।) यथार्थता का स्वरूप जैसा जिसकी मौलिकता है उसे इंगित करने, निर्देशित करने और चिन्हित करने के रूप में श्रुति का प्रयोजन सार्थक होता हुआ नजर आता है। प्रत्येक इकाइ का स्वरूप रूप, गुण, स्वभाव,धर्म के रूप में व्याख्यायित होना पाया जाता है। इन चारों आयामों की अविभाज्यता में प्रत्येक एक व्यवस्था के रूप में मूल्यांकित होता है और प्रत्येक एक क्रिया के रूप में ही मिलता है।

(1) पदार्थावस्था में आकार, आयतन, घन के रूप में रूप; सम-विषम मध्यस्थ क्रियाकलाप के रूप में गुण; संगठन-विघटन के रूप में स्वभाव और अस्तित्व सहज रूप में धर्म स्पष्ट है। पूर्णता को इंगित करने-कराने के अर्थ में प्रयोग किया गया भाषा एवं परिभाषा [M18.1]है।

(2) प्राणावस्था में आकार, आयतन, घन के रूप में रूप; सम-विषम मध्यस्थ के रूप में गुण; सारक-मारक के रूप में स्वभाव और अस्तित्व सहज पुष्टि रूप में धर्म होना समझ में आता है।

(3) जीवावस्था में आकार,आयतन,घन के रूप में रूप; सम-विषम मध्यस्थ के रूप में गुण; क्रूर-अक्रूर के रूप में स्वभाव और अस्तित्व पुष्टि सहित आशा के रूप में धर्म पहचानने में आता है।

(4) ज्ञानावस्था में मानव आकार, आयतन, घन के रूप में रूप; सम-विषम मध्यस्थ के रूप में गुण; धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा के रूप में स्वभाव; अस्तित्व पुष्टि आशा सुख के रूप में धर्म समझ में आता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि स्वभाव एवं धर्म ही प्रत्येक अवस्था की मौलिक पहचान है और क्रम से पदार्थावस्था में रूप; प्राणावस्था में रूप, गुण; जीवावस्था के रूप, गुण, स्वभाव; ज्ञानावस्था में मानव रूप, गुण, स्वभाव, धर्म प्रधान पहचान सार्वभौम होना पाया जाता है।

मानव परम्परा में सार्वभौमता एक अपेक्षा है। सार्वभौमता को नित्य निरंतर बनाये रखने के क्रम में अथवा परम्परा के रूप में निर्वाह करने के क्रम में श्रुति सहज आवश्यकता है; उसकी निरंतता के लिए निश्चयन और पारंगत होने की विधि मानव परम्परा में, से, के लिए सार्थक होना पाया जाता है।

उक्त जिज्ञासा सार्थकता के योगफल सहज विधि से भाषाओं का निर्देष्ट अर्थ प्रसवन सहज उपलब्धि को पाने के लिए विविध देश काल में अथक परिश्रम किया गया है। भाषाएँ मानव को आज की स्थिति में सहज सुलभ हुई ही है। भाषा सहज विकास उसका अर्थ सहज प्रभाव प्रक्रिया

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