अवस्था तक में भी मानव शरीर सर्वाधिक विकसित है यह पहचानता है। अपनी परम्परा को अभी तक समुदाय चेतना में ग्रसित रहते हुये भी संस्कृति, सभ्यता, विधि, व्यवस्था के नाम पर (अर्थात् शिक्षा-संस्कार, संविधान और राज्य व्यवस्था के रूप में) परस्परता को पहचानने का प्रयास सुदूर विगत से अब तक भ्रमित मानव ने किया। अभी जिस प्रकार से मानव है वह सर्वविदित है। मानव की सम्पूर्ण संप्रेषणा, अनुभव, विचार, व्यवहार, उत्पादन, व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में है। इसलिए जागृति विधि साधना को व्यवस्था में जीने के रूप में पहचानना एक अपरिहार्यता समीचीन है। संभावना और समझदारी सहज आपूर्ति के अर्थ में यह मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान शास्त्र है। “जागृति विधि साधना” अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन का फल है। यह “जीवन-विद्या” पूर्वक जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयतापूर्ण आचरण पूर्वक संपन्न होने वाली प्रक्रिया है। प्रत्येक मानव जीवन और शरीर के संयुक्त साकार रूप में है, यह जीवन-विद्या में स्पष्ट हो जाता है। जीवन सहज रूप में चयन, आस्वादन, विश्लेषण, तुलन, चित्रण व चिंतन, संकल्प, बोध और प्रामाणिकता अनुभव है। यह अक्षय रूप मानव में है यही जीवन विद्या का सार और स्वीकृत है। इसीलिए यह सार्वभौम होना स्पष्ट है, आवश्यक है। ये सभी क्रियाएँ जीवन में अविभाज्य हैं। ऐसी अविभाज्यता को मानव परम्परा में प्रमाणित करना ही जीवन सहज न्याय, सुख, शांति, संतोष, आनंद के रूप में है और मानव सहज न्याय सूत्र मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में सूत्र प्रमाणित होता है। जीवन क्रियाकलाप अविभाज्य रहते हुए न्याय अर्थात् मानव धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) और सत्यपूर्ण प्रणाली से कार्य करने की व्यवस्था प्रत्येक मानव में, से, के लिए समीचीन है।
प्रत्येक जागृत मानव न्याय दृष्टि से (न्याय रूपी तुलन क्रिया से) निरीक्षण-परीक्षण करता है। यह क्रिया जागृति विधि साधना का प्रथम सोपान है। साधना का तात्पर्य अभ्यास से है। अभ्यास का तात्पर्य कर्माभ्यास, व्यवहाराभ्यास, चिन्तनाभ्यास से है। व्यवस्था के मूल में जो विचार रहता है उसको मानव के हर कार्य में चिंतनाभ्यास पूर्वक न्याय दृष्टि से निरीक्षण-परीक्षण करना “जागृति विधि” है। चिन्तन का तात्पर्य समझ और प्रयोजन के तृप्ति बिन्दु का साक्षात्कार करने से है।
प्रत्येक जागृत मानव में जीवन सहज रूप में तुलन क्रियायें न्याय- अन्याय, धर्मा-धर्म, सत्या-सत्य क्रम से प्रिय, हित, लाभ न्याय संगत सम्मत सहज संपन्न होती है। न्याय संबंधों रूपी सहअस्तित्व पर आधारित है। धर्म (सर्वतोमुखी समाधान = मानव स्वयं मानवत्व सहित व्यवस्था है, समग्र व्यवस्था में भागीदार है।) इस आधार पर “सत्य” अस्तित्व रूपी परम सत्य