के अर्थ में ही शब्द और वाक्य, शब्द वाक्य संगत सूत्र, वाक्य संगत परिभाषा सूत्र संगत गद्य पद्य, प्रबंध, निबंध रूपों में सभी भाषावादियों-भाषाविदों के समुन्नत परिष्कृत निश्चित रूप प्रदान करने का कार्य अदम्य रूप में किया। इस को क्रमागत विधि सम्मत भाषाओं को मूल्यांकित किया जाना सहज है आवश्यक भी है।
मानव परम्परा में पीढ़ी से पीढ़ी भाषापूर्वक शुभ, धर्म, सत्य, जागृति, भक्ति, विरक्ति, जीवन, जीवजगत, वस्तुओं का नामकरण, क्रियाओं का नामकरण, देशकाल, दिशा का नामकरण उपलब्ध हुआ। ये सब श्रुति के रूप में ही गण्य होता है। इतना ही नहीं सत्य, परम सत्य, उद्धार, सार्थक, स्वर्ग, नरक, पाप, पुण्य, भक्ति, विरक्ति, बंधन, मोक्ष हर देवी-देवताओं को निश्चित रूप में इंगित, बोध कराने के आशय से भाषाओं में अथक प्रयास हुआ। सर्वाधिक सम्मान जनक भाषाओं को मानव परंपराओं के लिए विगत के मनीषियों ने प्रदान किया है। जबकि मानव भाषा कारण, गुण, गणित के अविभाज्य रूप में है। जिससे ही परम सत्य रूपी सहअस्तित्व भास-आभास पूर्वक प्रतीति सहज बोध सार्थक होना पाया गया। फलतः अनुभव होना सिद्ध हुआ।
भाषा के रूप में भाषा अपने गति में व्यापार भाषा, यांत्रिक भाषा, व्यवसाय भाषा, व्यवस्थात्मक भाषा, राजनैतिक भाषा, दार्शनिक भाषा, शास्त्रीय भाषा, साहित्य भाषा, सांकेतिक भाषाओं के वर्गीकृत रूप को भी प्रस्तुत करने का प्रयास देखने को मिला है। इन सब प्रयासों के प्रति वर्तमान पीढ़ी कृतज्ञ है ही। पीढ़ी से पीढ़ी श्रुति की सार्थकता को पहचानने की कोशिश किया गया। अभी भी शोध प्रयास जारी है। इन्हीं शोध प्रयास के चिन्ह रूप में अनेकानेक धर्म, समुदाय, मत, जाति, वेश, पंथों को पहचानना बना ही है। अभी भी सम्पूर्ण धरती पर उचित संप्रेषित जितने भी प्रकार की श्रुतियाँ है उन सबके साथ विविधि प्रकार से किये गये शोध के उपरान्त भी सार्वभौम प्रयोजन लोक व्यापीकरण होना संभव नहीं हो पाया। यह विकल्प के लिए प्रेरक रहा है।
उक्त विधि से निरूपण यथार्थता, सत्यता, वास्तविकता की जिज्ञासा वश ही अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन मानव के लिए समीचीन हुई। इसमें परम्परागत भाषा अथवा शब्दों को कारण, गुण, गणित के अर्थ में प्रयोग किया है। जहाँ-जहाँ परम्परागत विधि से मान्य अर्थ है या अर्थ सूचक है उसे परिभाषा विधि से सहअस्तित्व तथ्यों और प्रयोजन सहज तथ्यों को इंगित कराने की प्रणाली अपनाया हुआ है। इसी के साथ तथ्यों की धारक-वाहकता के रूप में मानव को निश्चित ध्रुव के रूप में पहचान चुके हैं। इस प्रकार से धारक-वाहकता एक ध्रुव, सहअस्तित्व एक ध्रुव, मानव प्रयोजन, जीवन प्रयोजन एक-एक ध्रुव, के रूप में पहचान चुके