होने के लिए, समझने के लिए अनुकूल परिस्थिति निर्मित हो रही है। पुनःश्च हवा, पानी, धरती के शोषणवश इन सब में विसंगतियाँ सोचने-समझने जागृत होने के लिए निर्देशित कर रहा है। यह भी इसी के साथ निश्चित होता है कि मानव इस धरती पर जागृति पूर्वक ही जी सकता है अन्यथा सहअस्तित्व सहज नैसर्गिकता अपने आप मानव प्रजाति के लिए स्वर ताल भंगिमा में प्रस्तुत होना आरंभ कर दिया है। अतएव मानव प्रजाति को जागृति पूर्वक जीने की विधि कला, उपक्रम, उपाय, शोध कार्यों को अपनाना ही होगा। इसी क्रम में अभ्युदय सहज सार्थकता को बोध कराने के उद्देश्य से ही यह श्रुति रूपी वांड्गमय मानव के लिए प्रस्तुत है।

मानव संचेतना जागृत जीवन सहज रूप में सम्पन्न होने वाली जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने वाली संयुक्त क्रियाकलाप है। जानने व मानने के बीच तृप्ति बिन्दु स्वयं अनुभव होने के कारण अनुभव मूलक विधि से मानव अपनी जागृति सहज प्रमाणों को हर आयाम, दिशा, कोण परिप्रेक्ष्यों में प्रमाणित करता है। यह सार्वभौमता अखंडता अक्षुण्णता के अर्थ में इंगित संप्रेषित होना सार्थक पाया जाता है। यह सर्व मानव की अपेक्षा-आकाँक्षा भी है, समीचीन भी है अतएव सहअस्तित्व सहज परम सत्य को संप्रेषित अभिव्यक्त करने योग्य श्रुति को पहचानना भी एक आवश्यकता है।

जागृत मानव सहज स्वराज्य और स्वतंत्रता पूर्वक सम्पूर्ण प्रमाणों को प्रस्तुत करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। स्वराज्य कार्यकलाप में प्रमाणित होने के क्रम में स्वाभाविक रूप में हर मुद्दे, हर परिस्थिति संयोग,योग-वियोगों में सार्थकता को अनुभव करने योग्य हो जाता है। नियति सहज घटना क्रम में मंजिल अपने आप में विकास और जागृति ही है। मानव सहज अध्ययन क्रम में यह हमें समझ में आया है कि जीवन विकसित वस्तु है शरीर विकासशील वस्तु है। जीवन विकास के अनंतर जागृति मंजिल को पाना ही एक मात्र उद्देश्य नियति विधि से स्पष्ट है। जागृति सहज आवश्यकता मानव में सदा-सदा निहित है ही। यही संस्कारानुषंगीयता का संभावना सहज सूत्र है। इसी सूत्र के अनुरूप शोध और अनुसंधान मानव के द्वारा ही संपादित करना नियति है। यही रहस्य मुक्त प्रणाली बद्ध निश्चित प्रक्रिया है। यह यांत्रिकता से भी मुक्त है। इसे संप्रेषित अभिव्यक्त करने के क्रम में श्रुति अपने महत्व को स्पष्ट करता ही है जैसे यह वांङमय अपने में एक मिसाल है ही। सहअस्तित्ववादी श्रुति के अनुसार अस्तित्व सहज स्थिरता से बोध सुलभ हो जाता है, जैसे सत्ता में संपृक्त प्रकृति।

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