सहअस्तित्व सहज का मूल रूप यही है। यह बोध सुलभ होना आवश्यकता और समीचीनता है ही। श्रुति संयोजन पूर्वक यह बोध सुलभ होता हुआ अनेकानेक नर-नारियों के साथ अध्ययन विधि को प्रयोग कर चुके है यह सहज ही बोध होना पाया गया है। मानव जितना अधिकाधिक सार्थक विचार शैली के लिए जिज्ञासु बन चुका रहता है निरर्थकता का समीक्षा बन चुकी रहती है। ऐसे मनः पटल पर यह सहअस्तित्व वादी विचार तत्काल ही जानने-मानने में होता हुआ देखा गया है। देखा गया का तात्पर्य समझा गया है। इस तथ्य के आधार पर आगे और भी सफल कार्य गवाहित हुए है। इसे प्राथमिक शिक्षा के रूप में श्रुति बद्ध किया गया, प्रयोग किया गया है। यह हर मानव संतान में स्वीकृत होना, इंगित होना पाया गया है। आगे और भी प्रयोग श्रृंखला शिक्षा विधा में संपन्न करने का उद्देश्य है ही यह मानव संचेतना वादी मनोविज्ञान रूपी श्रुति भी जागृत मानव शिक्षा-संस्कार की कड़ी के रूप में सार्थक होने का उद्देश्य निहित है।

सम्पूर्ण श्रुति सहज सार्थकता अस्तित्व सहज सहअस्तित्व को बोध कराने, जीवन सहज जागृति को बोध कराने, प्रत्येक एक अपने त्व सहित व्यवस्था सहज अभिव्यक्त होने मानव परम्परा में सार्वभौम व्यवस्था अखंड समाज पूर्वक सार्थक सहज तथ्यों को बोध कराने और सहअस्तित्व सहज नियम, नियंत्रण, संतुलन के तथ्यों को बोध कराने के रूप में है। इसी के साथ प्रत्येक एक रूप, गुण, स्वभाव, धर्म सहज अविभाज्यता सहित समग्र व्यवस्था करने कराने के अर्थ में सार्थक होना पाया जाता है।

व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के लिए जितनी भी भाषा है वह सब श्रुति है। मूल्य और मूल्यांकन के लिए जितनी भी भाषा है वह सब श्रुति है। संबंधों की पहचान मूल्यों का निर्वाह करने की जितनी भी भाषा है वह सब श्रुति है। तन-मन-धन रूपी अर्थ का सदुपयोग व सुरक्षा के लिए जितनी भी भाषा है वह सब श्रुति है। परिवारीय आवश्यकता से अधिक उत्पादन तथा लाभ हानि मुक्त विनिमय के लिए जो भी भाषा है वह सब श्रुति है। जीवन जागृति, प्रामाणिकता, सर्वतोमुखी समाधान और स्वानुशासन के लिए जितनी भी भाषा है वह सब श्रुति है।

अस्तित्व, अस्तित्व में सहअस्तित्व, सहअस्तित्व में विकास, जीवन, जीवन जागृति, रासायनिक-भौतिक रचना विरचना और इनके अंतर्संबन्धों व प्रयोजनों को-जानने मानने की जितनी भी भाषा है वह सब श्रुति है। इस प्रकार मानव कुल के लिए स्वयं स्फूर्त रूप में श्रुति की कितनी आवश्यकता, अनिवार्यता, अपरिहार्यता है इसे मानव सहज रूप में समझ सकता है। प्रयोग कर सकता है।

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