सार्वभौम व्यवस्था, स्वानुशासन रूपी चरित्र, मूल्य, नैतिकता की मानसिकता का लोकव्यापीकरण सहित प्रमाणित करने की आवश्यकता निर्मित हुई है। इसी क्रम में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन ज्ञान के आधार पर यह “मानव-संचेतनावादी मनोविज्ञान” प्रणयित हुआ है। इसमें सम्बंधों को जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना प्रधान तत्व है। यही मानव संचेतना का निश्चित स्वरूप है। जागृत मानव का सम्पूर्ण क्रम उक्त चार स्वरूप में व्याख्यायित है। ऐसी चार क्रियाएँ प्रत्येक मानव में, से, के लिए प्रमाणित होने का अध्ययन है। जैसे माता की कोख में आई संतान सर्वप्रथम मां को ही पहचानती है क्योंकि उनसे पोषण कार्य सम्पन्न होता हुआ शैशव काल में ही जीवन पहचान लेता है। फलस्वरूप मां को पहचानना संभव हो जाता है। उसी के साथ-साथ संरक्षण कार्य सूत्रित होना आरंभ होता है। शिशु के प्रति अपेक्षा माता-पिता में यही बनी रहती है कि शिशु स्वस्थ रहे, खुश रहे, उत्सवित रहे। इसी प्रत्याशा को सफल बनाने के लिए विविध प्रकार के उपायों को अनुसंधान करते और प्रयोग करते माता-पिता को देखा गया है। जैसे ही शिशु काल से कौमार्य अवस्था समीचीन होती है वैसे ही जागृत अभिभावक जागृति व सम्बंधों को पहचानने, मूल्यों को निर्वाह करने के अर्थ में प्रेरक होना पाया जाता है। साथ ही आहार प्रणालियाँ ऐसी शिशु और कौमार्य अवस्था से ही स्वीकार होने लगती है।
भ्रमित परम्परा में रूढ़ियाँ व्यक्तिवादी परिवार समुदाय क्रम में रूढ़ियाँ (सामुदायिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत रूढ़ियाँ) क्रम से कौमार्य अवस्था की मानव संतान को प्रभावित कर लेती हैं। कौमार्य अवस्था के पहले से ही, भ्रमित समुदायों, परिवारों में अभ्यस्त विधि से आहार प्रणाली (चाहे वह शाकाहार हो, दुग्धपान हो, चाहे मांसाहार हो, मद्यपान हो) के अभ्यस्त हो जाते हैं।
कौमार्य अवस्था में जैसे ही करो, न करो का चक्र चलना आरंभ होता है (जो माता-पिता करते रहते हैं उसे ‘नकारने’ की स्थिति में और जो माता-पिता नकारते रहे उसे स्वीकार करने से या शंका उत्पन्न करने से) माता-पिता का ममता सूत्र डगमगाना आरंभ होता है। माता-पिता में ममता का सूत्र, उदारतापूर्वक सूत्रित रहता है। ममता डगमगाने का तात्पर्य उदारता का भी डगमगाना होता है।
इसी क्रम में शिक्षा की भी बात आती है, क्योंकि सम्पूर्ण संस्कार “करो, न करो” में सिमट ही जाता है। जैसे ही यांत्रिक, तकनीकी विज्ञान आंकलनात्मक शिक्षा आरंभ होती है, वैसे ही मानव संतान में प्रचलित शिक्षा को प्रबोधन पूर्वक स्मृति के आधार पर परीक्षण विधि को अपनाते हुए विद्यार्थियों को विद्वान घोषित किया जाता है। आदि काल से पुस्तक और स्मृति को दुहराना