सहज आनंद, अस्तित्व में नित्य अनुभूति, आनंद की निरंतरता के रूप में अथवा स्रोत के रूप में पाया जाता है। इस प्रकार जीवन ज्ञान अस्तित्व दर्शन की सार्थकता स्पष्ट है।
मानवीयता पूर्ण आचरण परम आचरण है अथवा सम्यक आचरण है। यह आचरण मानवत्व का सूत्र और व्याख्या है क्योंकि अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इस क्रमानुगत विधि से मानव ‘’मानवत्व” सहित व्यवस्था है यह प्रमाणित होता है।
मानवीयता का स्वरूप मानवीय आचरण है जो मूल्य, चरित्र, नैतिकता के रूप में प्रमाणित होता है। कार्य रूप में स्वधन, स्वनारी-स्वपुरूष, दया पूर्ण कार्य व्यवहार के रूप में देखा जाता है। यह मानवीयता पूर्ण चरित्र के रूप में प्रमाणित होता है।
मानवीयता पूर्ण आचरण में नीति का स्वरूप तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग और सुरक्षा के रूप में नैतिकता प्रमाणित होता है। प्रत्येक मानव में तन, मन, धन रूपी अर्थ एक दूसरे के पूरक रूप में दिखाई पड़ते हैं।
मूलतः मन से ही शरीर का संचालन होना देखा जाता है। तन और मन के वियोग की स्थिति में कोई कार्य शरीर से सम्पन्न नहीं हो पाता है और मानव की संज्ञा सार्थक नहीं हो पाती है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में वर्तमान रहना, मानव व्यवहार का आधार है। ऐसे व्यवहार कार्य के क्रम में उत्पादन कार्य भी एक आवश्यकीय कृत्य है। उत्पादन का तात्पर्य तन-मन सहित प्राकृतिक ऐश्वर्य अर्थात् पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था पर श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता मूल्य, कला मूल्य स्थापित करना है। इसी क्रम में सम्पूर्ण महत्वाकाँक्षा और सामान्य आकाँक्षा संबंधी वस्तुओं का उत्पादन हुआ है। इसमें निपुणता, कुशलता प्राप्त करने के क्रियाकलापों को प्रशिक्षण नाम दिया जाता है। यह पूर्णतया चित्रण सहज तकनीकी सम्पन्न मानसिकता है। इसमें शरीर के अंग-अवयव के संयोजन पूर्वक हस्त लाघव सहित श्रम नियोजन संपन्न होता है। इस विधि से मानव को हमने उत्पादन कार्य में सफल होते हुए देखा है। अभी तक के उत्पादन क्रियाकलापों में विकृति का स्वरूप लाभोन्मादिता ही है। यह भय और प्रलोभन पर आधारित है। इसके विकल्प के रूप में “मूल्य और मूल्यांकन” रूपी प्रौद्योगिकी एवं “समाज व्यवस्था सूत्र” को व्याख्यायित और स्थापित करना इस मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान की अभीप्सा है। उक्त प्रकार से उत्पादन कार्य और उसकी मानसिकता स्पष्ट हो चुकी है।