उत्पादन ही धन है - इस प्रकार तन, मन, धन का स्वरूप स्पष्ट हुआ है। इनकी उपयोगिता, सदुपयोगिता और प्रयोजनशीलता विधि से मूल्यांकन संभव हो जाता है। वस्तु का मूल्यांकन उपयोगिता और सुन्दरता के आधार पर मन का मूल्यांकन अनुभव मूलक विधि से कार्य व्यवहार के रूप में मूल्यांकित हो जाता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के साथ मूल्यांकित हो जाता है। मूल्यांकन का आधार मानव संबंध और नैसर्गिक संबंध है। मानव परम्परा में दोनों प्रकार के संबंध वर्तमान है और इनका निरंतर होना पाया जाता है। मानव परम्परा मानसिकता विवेक विज्ञान विचार सम्मत होने के कारण, मनोविज्ञान की समझ जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने के रूप में (अथवा मनोविज्ञान सहज संबंध) एक आवश्यकता है।
मानव संबंध प्रधानतः सात रूपों में है।
माता-पिता पुत्र-पुत्री संबंध - संबंध का तात्पर्य पूर्णता के अर्थ में अनुबन्ध से है। अनुबंध का तात्पर्य अनुक्रमात्मक विधियों की स्वीकृति क्रिया है अथवा स्वीकृतिपूर्ण और उसकी निरंतरता रूपी क्रिया है। अनुक्रम का तात्पर्य अनुस्यूत (निरंतर) क्रिया है। निरंतर का तात्पर्य वर्तमान क्रिया से है। वर्तमान का तात्पर्य अस्तित्व सहज सहअस्तित्व से है। अनुस्यूत (निरंतर) क्रिया स्थिति और गति के रूप में दृष्टव्य है। सहअस्तित्व विधि में पूरकता क्रम, जागृति क्रम, जागृति पूर्णता और उसकी निरंतरता ही अनुस्यूतता है। इस प्रकार पूर्णता का अर्थ जागृति और उसकी निरंतरता से है। अनुक्रमात्मक विधि की सार्थकता परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में प्रमाणित होना समीचीन है। इस प्रकार सम्पूर्ण संबंध व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में सार्थक होना पाए जाते हैं।
सम्बंधों की पहचान एवं निर्वाह की आवश्यकता को सहज रूप में ही पहचाना जाता है। पिता-पुत्र संबंध में मूल्यों को प्रमाणित करना, परम्परा में इसका शिक्षा-संस्कार और व्यवहार प्रमाणपूर्वक ही सफल होना पाया जाता है। इस बीसवीं शताब्दी की दसवीं दशक तक व्यक्तिवादी समुदायवादी परम्परा में अभी तक की शिक्षा-संस्कार विधियों से समुदायवादी अथवा व्यक्तिवादी प्रयासों की अपेक्षा में होते हुए भी, स्वतंत्रता और स्वराज्य रूपी ध्रुवों के आधार पर सफल होने का आधार किसी परम्परा में करतलगत नहीं हुआ अर्थात् व्यवहार में प्रमाणित, शिक्षा में प्रबोधित नहीं हुआ। जिसके फलस्वरूप पुनः व्यक्तिवादी मानसिकता और समुदायवादी मानसिकता के लिए मानव विवश होते आया। इस प्रकार व्यक्तिवादी समुदाय परम्परा का स्वरूप स्पष्ट हो गया। सर्वमानव जागृति सहज विधि से इसे स्वतंत्रता और स्वराज्य पूर्वक अखंड समाज