व्यक्तित्व का तात्पर्य - आहार, विहार, व्यवहार के रूप में प्रमाणित होना। व्यक्तित्व = आचरण, प्रतिभा = समझदारी।
प्रतिभा का तात्पर्य - जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन व मानवीयतापूर्ण आचरण में पारंगत होना।
सौहार्द्र :- जिस प्रकार से स्वीकृति हो उस अवधारणा, अनुभव, स्मृति और श्रुति को यथावत प्रस्तुत करने का क्रियाकलाप।
सम्मान अथवा सम्मानात्मक मानसिकता तभी संभव हो पाती है जब मूल्यांकन विधियों को जानने-मानने, पहचानने और निर्वाह करने कीआवश्यकता महसूस होती है। मूल्यांकन सहज आवश्यकता, जागृत जीवन का कार्यक्रम प्रमाण सहज प्रक्रिया है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने में स्वयं को मूल्यांकित करने में तभी समर्थ हो पाता है जब जीवन ज्ञान से संपन्न होता है। जीवन ज्ञान प्रत्येक मानव की सहज आवश्यकता है। मानवीयता पूर्ण परम्परा में प्रत्येक मानव को जीवन ज्ञान सहज ही सुलभ होना नित्य समीचीन है। इसी आधार पर मानव में, से, के लिए मूल्यांकन क्रिया प्रत्येक व्यक्ति को स्वीकार्य है।
मूल्यांकन के आधार पर ही सम्पूर्ण परावर्तन में यर्थाथता ही वर्तमान रहता है। मूल्यांकन जागृति सहज मान्यता के आधार पर किए जाने की स्थिति में अपरिवर्तित रहता ही है। किसी भी आयाम, दिशा, कोण, परिप्रेक्ष्य में श्रेष्ठता की स्वीकृति सहित प्रकाशन ही सम्मान के रूप में समर्पण पूर्वक स्पष्ट होता है। जो जिस श्रेष्ठता के लिए अर्पित होता है वह अपने में भी सम्मान का अनुभव करता है। अर्पित रहने का तात्पर्य स्वीकृति व प्रमाणों से है।
ऐसे उभय सम्मान और स्वीकृतियाँ उत्सव के स्वरूप में ही प्रमाणित होती हैं। यह स्वयं में, से, के लिए सुख, शांति, संतोष, आनंद और उदात्तीकरण अर्थात् परस्परता में पूरकता स्वाभाविक रूप में देखने को मिलता है। ऐसे परस्पर उदात्तीकरण की अभीप्सा प्रत्येक मानव की होती है। जागृत जीवन श्रेष्ठता का मूल्यांकन करता है। जागृति क्रम में हर मानव में मूल्यांकन की अपेक्षा और प्रयास रहता है।
अरहस्यता (वर्तमान में विश्वास) के साथ सौहार्द्रता :- उभय तृप्ति में सामंजस्यता और संगीत प्रमाणित होने से है जिससे उत्सव का अनुभव होना पाया जाता है। उत्सवता ही सुख सहज अनुभव का प्रकाशन है। सुखपूर्वक ही अनुभव का प्रकाशन अरहस्यता और सौहार्द्रता का प्रमाण है। विचारों की एकरूपता, मूल्यांकन की एकरूपता को एक से अधिक व्यक्ति जब जानते-