भी है, जितना भी है वह सब परस्परता में सम्बन्धित है। इनमें जागृत होना ही मानव का अधिकार है।
मानव ही जागृत व जागृति पूर्ण होता है, हो सकता है, होने के लिये इच्छुक है। इस कारण पहचानना निर्वाह करना और जानना-मानना सहज है। इसी क्रम में पति-पत्नी संबंध भी सहज है। इस संबंध में शरीर (अथवा तन) संबंध, अन्य संबंधों से भिन्नता का आधार है। शरीर संबंध मानव संतानार्थ सार्थक है। यही व्यसन के रूप में अथवा कामोन्माद के रूप में परिवार के असंतुलन तथा अव्यवस्था के रूप में परिणित होता है।
परिवार मूलक विधि से ही स्वराज्य व्यवस्था नैसर्गिक है। व्यवस्था प्रत्येक मानव का अभीष्ट है। इस प्रकार मानव परिवार के ध्रुव के रूप में पति-पत्नी का संबंध, पहचान व निर्वाह सहज है।
पति-पत्नी का मानस परिवार के आकार में सुदृढ़ होना ही एक मन, दो शरीर का तात्पर्य है। साथ ही जीवन जागृति का संकल्प होना एक मन दो शरीर का तात्पर्य है। जीवन जागृति प्रत्येक मानव की अभीप्सा है। जीवन जागृति जीवन-विद्या (ज्ञान) बोध होने के उपरान्त है। यह जीवन क्रियाकलापों के अंतर्सम्बन्ध को परस्पर जीवन प्रभाव क्षेत्र अनुबन्ध क्रम से स्पष्ट करता है। निरीक्षण-परीक्षण विधिपूर्वक अभ्यास से दृष्टा पद प्रतिष्ठा सहज ही प्रमाणित होता है। द्रष्टा पद प्रतिष्ठा को प्रमाणित करना ही यतीत्व व सतीत्व का तात्पर्य है। एक पत्नी व्रत, एक पतिव्रत भी यतीत्व और सतीत्व का प्रमाण है। इस प्रकार स्वानुशासन के रूप में दृष्टा पद का, जीवन जागृति का प्रमाण मानव सहज है।
इस धरती में ही चारों अवस्थाओं का वैभव वर्तमान है। इस धरती पर मानव संतान संख्या का नियंत्रण होना, पति-पत्नी का एकत्र निश्चय मानसिकता होना, मानव अखंड समाज के रूप में स्पष्ट होना, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सार्थक होना आवश्यक है। ये सब एक दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार दाम्पत्य में उभय मानसिकता निर्णयों में एक रूप होने से सहज ही सर्वशुभ समीचीन होता है। इसका आधार मानवीयता है। जिसका प्रमाण स्वयं के प्रति विश्वास और श्रेष्ठता के प्रति सम्मान करने योग्य होना है।
41. माता 42. पोषण
पोषण :- इकाई + अनुकूल इकाई।