माता जब पुत्र-पुत्रियों को पहचानती है, तभी मातृत्व का प्रसव गुण पोषण के रूप में प्रमाणित होता है। स्वभाव गति सम्पन्न प्रत्येक मां अपनी संतान को पहचानती है फलतः निर्वाह करती है। इसी कारणवश, संतान की शरीर स्वस्थता और मानसिकता का माता एवं परिवार द्वारा पोषण सम्पन्न होता है जो संस्कार कहलाता है। मां अपनी संतान की स्वीकृत मानसिकता का स्रोत है। साथ ही भाषा, संबोधन, सम्बंधों की पहचान, संस्कार (स्वीकारने के लिए निर्देशन) का स्रोत भी है। सम्बंधों के आधार पर संबोधनों का होना सहज है।

उल्लेखनीय (ध्यान देने योग्य) मुद्दा यह है कि मां ही प्रथम प्रधान कारण है कि वह बोली, भाषा, खान-पान में, संबोधन में विश्वास को स्थापित करती है। संबोधन से संबंधों में विश्वास स्थापित करना सहज है। इसी क्रम में जाति, धर्म, कर्म का मूल संस्कार भी अधिकांश रूप में मां से संतानों को अंतरित-निक्षेपित होता है। शैशव बाल्य अवस्था में बालक विश्वास को आधार मानता है। मां पर संतानों का विश्वास होना एवं पोषण-संरक्षण होना सहज रूप में देखा जाता है।

इस धरती पर जितनी भी समुदाय परंपराएँ हैं वे सब किसी नस्ल, रंग, रहस्यात्मक धर्म, संप्रदाय, पंथ, मत, भाषा, देशत्व वाली मानसिकता एवं संस्कारों को प्रदान करती हैं। प्रत्येक समुदाय में विभिन्न भाषावादी लोगों के होते हुए भी संबंधों में संबोधन का अर्थ अधिकांश समान है। यह मानव सहज अभिव्यक्ति है। प्रत्येक देश, भाषा, काल में मानव की परस्परता में संबोधन सहज रहा है। इसका अर्थ भी सहज रहा है। ये दोनों स्थितियाँ अपने आप में प्रमाणित करती हैं कि संबंध अस्तित्व सहज रूप में रहता ही है। फलतः सम्बोधन व अर्थ प्रकाशित होता है।

मानव, अस्तित्व सहज प्रकाशन है साथ ही जागृति क्रम में प्रकाशन है। यह प्रत्येक मानव में प्रमाणित होता है। प्रत्येक मानव सुख धर्मी है। सुख की अपेक्षा में ही मानव समस्त संबंधों को पहचानने व निर्वाह करने के क्रम में है। यह मानव में दृष्टव्य है। मानव का संबोधन के साथ संबंधों का अर्थ एवं आचरण सहित सहज होना पाया जाता है।

माता ही शरीर का पोषण, भाषा का पोषण, नाम का पोषण, परिचयों का पोषण, संस्कृति का पोषण करने के क्रम में संस्कारों का निक्षेपण सहज रूप में करती है। प्रत्येक मां अपनी संतान को सम्बंधों का सम्बोधन प्रारंभिक अवस्था में सिखाती है और जैसे-जैसे ही उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे ही सम्बोधन के साथ गौरव, विश्वास, सेवात्मक आचरणों को सिखाती है। मानव को मानवीयता सम्पन्न होने के लिए सम्बोधनों एवं आचरणों को सिखाना आवश्यक है। जिससे सभी

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