और अस्तित्व को देखने योग्य होता है। देखने का तात्पर्य समझने से है। समझने का तात्पर्य, अनुभव से है। अनुभव का तात्पर्य प्रमाणों से है। प्रमाणों का तात्पर्य जानने- मानने, पहचानने- निर्वाह करने से व उसकी तृप्ति-बिन्दु की अभिव्यक्ति से है।

मानव अपनी दृष्टा पद प्रतिष्ठा में देश, काल, दिशा को सहज ही पहचानने व निर्वाह करने योग्य है। रासायनिक-भौतिक रचना में जो विस्तार दिखाई पड़ता है और एक रचना तथा दूसरी रचना की परस्परता में दिखने वाली दूरी पर सहअस्तित्व के रूप में देश है। इसका तात्पर्य यह है कि सत्ता में संपृक्त प्रकृति ही सहअस्तित्व है। सत्ता रूपी साम्य ऊर्जा परस्पर इकाईयों अथवा रचनाओं के बीच दिखने वाली दूरी है और सत्ता हर वस्तु में पारगामी परस्परता में पारदर्शी है। इस प्रकार देश स्पष्ट हुआ। ऐसे ‘देश’ में रचना और इकाईयों की परस्परता में दिशा की स्थिरता है क्योंकि ऊर्जा स्थिर है। सम्पूर्ण रचना और इकाइयाँ स्थिति और गति सहित व्यवस्था रूप में निश्चित और वर्तमान हैं। इसे प्रक्रिया के रूप में इकाई अथवा रचना में किसी एक ध्रुव बिंदु के आधार पर अनेक कोणों में निकाला जाता है। ऐसे प्रत्येक कोण किसी एक दिशा सूचक दूसरी विधि से किसी एक की नैसर्गिकता में (अर्थात् किसी एक के सभी ओर जो इकाईयाँ हैं वह सब) उन-उनके कोणों से दिशा के रूप में वांछित इकाई की स्थिति की दिशा को स्पष्ट कर देता है।

इस प्रकार दिशा परस्पर देश; उसमें भी परस्पर वस्तु के आधार पर स्पष्ट हुई है। काल के संबंध में “क्रिया की अवधि = काल” , जबकि क्रिया की निरंतरता रहती ही है। किसी एक निश्चित क्रिया की अवधि को पहचानने के उपरान्त काल की गणना की जाती है। काल का ज्ञान क्रिया के आधार पर होते हुए क्रिया की निरंतरता को भूलने के आधार पर अथवा भूलाने के आधार पर (अथवा न जानने के फलस्वरूप) काल के संबंध में अनिश्चितता बनी रहती है। यह भी मानव के भ्रमित रहने का साक्षी है। काल की अभिव्यक्ति क्रिया करती है। प्रत्येक रचना व इकाईयाँ क्रियाशील हैं। अस्तु यह तीनों देश, काल, दिशा की संयुक्त अभिव्यक्ति वस्तु स्थिति सत्य के रूप में स्पष्ट है। इस प्रकार वस्तु स्थिति सत्य की अभिव्यक्ति मानव परम्परा में अनुभव मूलक विधि से प्रमाण है। इसी प्रकार स्थिति सत्य, वस्तु गत सत्य, अनुभव मूलक प्रणाली से प्रमाणित होता है।

अस्तित्व में मानव दृष्टा होने के कारण ही (यह) जानने-मानने, पहचानने निर्वाह करने की क्रिया करता है। जिसमें से पहचान निर्वाह क्रिया मनुष्येत्तर प्रकृति में भी नियम, नियंत्रण व संतुलन के अर्थ में स्पष्ट होती है। जानने-मानने की क्रिया मानव में ही देखने को मिलती है। ऐसे मौलिक

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