मानवीयता अपने कार्य व्यवहार रूप में वृत्ति (ऐषणात्रय) और निवृत्ति (स्वतंत्रता, स्वानुशासन) का अविभाज्य वर्तमान है। मूलतः वृत्तियाँ , जीवन शक्तियों का अथवा जीवन प्रभाव क्षेत्र का प्रत्यक्ष प्रभावीकरण है। मानव का सम्पूर्ण कार्य कायिक, वाचिक व मानसिक, कृत-कारित व अनुमोदित प्रभेदों के रूप में सर्वेक्षित तथ्य है। जागृत मानव के कायिक, वाचिक क्रियाकलाप के मूल में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा व प्रमाणिकता का होना पाया जाता है। यह समग्र रूप ही जागृत मानसिकता का तात्पर्य है। अस्तु , मानसिकता सहित ही प्रत्येक मानव, सम्पूर्ण कार्यकलापों को सम्पन्न करता है। ऐसे कार्यकलाप स्वयं व्यवस्था है व समग्र व्यवस्था में भागीदार हैं। इस रूप में कार्यरत होने की स्थिति में मानवीय प्रवर्तन होना पाया जाता है। यह तभी सहज संभव होता है जब मानव परम्परा में मानवीयता को पहचानने- निर्वाह करने, व मूल्यांकन करने में, लोकव्यापीकरण हो गया हो। लोकव्यापीकरण का कार्यक्रम मानवीय शिक्षा, मानवीय संस्कार और मानवीय राज्य-व्यवस्था मानव परम्परा में सुलभ हो गई हो। इसका प्रमाण यही है (अर्थात् यह जब कभी भी मानव के लिए सुलभ होगा) कि उस स्थिति में अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होगी।

अभी तक मानव ने समुदाय चेतना तक ही अपने को जागृति क्रम में भ्रमित रूप में पाया है। समुदाय चेतना में अपने पराए की दीवाल बनी ही रहेगी। ऐसी दीवाल जब तक रहेगी तब तक युद्ध-शोषण, द्रोह-विद्रोह की प्रक्रियाएँ बनी ही रहेंगी। ऐसी प्रक्रियाएँअपने आप में अमानवीयता का द्योतक हैं। अमानवीय मानसिकता पूर्वक अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी संभव नहीं है। इसलिए अमानवीयता से मानवीयता में संक्रमित होना ही आज की आवश्यकता है। अमानवीय चार प्रवृत्तियाँ , विषय, संग्रह, सुविधा और भोग में ग्रसित रहना पाया जाता है।

मानवीय दृष्टियाँ न्याय, धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) तथा सत्य हैं। इसी के आधार पर अर्थात् जीवन प्रकाश प्रभावशील होने की स्थिति में ही समाज न्याय, सार्वभौम व्यवस्था और प्रामाणिकता सहज सुलभ हो जाती है। यही अमानवीयता से मानवीयता की ओर गति भी है। यही मानव की वांछा, आशा व आकाँक्षा है।

संबंधों को पहचानने व मूल्यों का निर्वाह करने के क्रम में समाज न्याय का उभय तृप्ति के रूप में लोकव्यापीकरण होता है। तभी मानव परिवार व्यवस्था के रूप में जीने की कला को अभिव्यक्त कर पाता है। ऐसी स्थिति में सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी कर पाता है। सार्वभौम व्यवस्था का

Page 98 of 205