विरचनाएँ समृद्ध होती हैं। यह सब क्रियाकलाप स्वभाव गति प्रतिष्ठा में ही सम्पन्न होना पाया जाता है। जीवन पद में परमाणु का संक्रमित होना भी, स्वभाव गति में ही होता है।
संक्रमण एक ऐसा बिन्दु है जिसे समय का कालखंड उस अवधि को गिन नहीं पाता है। अपितु सूक्ष्मतम कालखंड में ही संक्रमण क्रिया संक्रमित हो पाती है। ऐसा मानव कल्पना में आता है। गठनपूर्णता रूपी घटनावश चैतन्य पद में संक्रमित परमाणु जीवन पद प्रतिष्ठा को प्राप्त किया रहता है। ऐसे जीवन और शरीर के योगफल में मानव परम्परा के रूप में वर्तमान है।
मानव में ही जीवन जागृति को व्यक्त करने योग्य शरीर भी सुलभ हुआ है। मानव प्रकृति सहज रूप में जागृति पूर्वक सुखी (समाज न्याय सम्पन्न), समाधानित (सार्वभौम व्यवस्था सम्पन्न), समृद्धि सम्पन्न, प्रामाणिकता पूर्ण (स्वानुशासन सम्पन्न) विधि से मानव परम्परा का वैभवित होना ही जागृति पूर्वक कीर्ति सम्पन्न होना है। मानवीयता पूर्ण जीने की कला के लिए आवश्यकीय मानसिकता से सम्पन्न होना ही वस्तु का तात्पर्य है।
5. निश्चय 6. धैर्य
निश्चय :- (1) लक्ष्य, दिशा और प्रयोजन की ओर गति। (2) सत्यता पूर्ण विचार की निरंतरता।
धैर्य :- न्यायपूर्ण विचार में निष्ठा एवं उसकी निरंतरता।
मानव में निश्चय मूलतः स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान है। जिसके प्रमाण में प्रतिभा व व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक (समाधान पूर्ण) व व्यवसाय में स्वावलम्बन है। ऐसी सहज अभिव्यक्ति मानव के निश्चय व धैर्य का प्रमाण है।
मानव का अपने स्वत्व रूपी मानवीयता के प्रति जागरूक होना धैर्य सम्पन्न होने के लिए परम आवश्यक है। अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था है। इस कारण मानव का मानवीयतापूर्ण पद्धति , प्रणाली , नीति पूर्वक व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदार होना सहज है। प्रत्येक व्यक्ति निश्चय और धैर्य सम्पन्न होना चाहता है। मानव परम्परा (प्रधानतः शिक्षा- संस्कार, संविधान व स्वराज्य व्यवस्था) में मानवीयता को पहचानने की आवश्यकता है।