कार्यवश मानव का विद्वान होना सहज है। अस्तु, जीवन जागृति और उसकी निरंतरता “विद्या” है। उसे अभिव्यक्त करना प्रज्ञा है।

प्रज्ञा की सार्थक अभिव्यक्तियाँ विज्ञान सम्मत विवेक, विवेक सम्मत विज्ञान है। विवेक का तात्पर्य प्रयोजनों से है। विज्ञान का तात्पर्य विश्लेषणों से है। सामान्य रूप में मानव प्रयोजन परिवार, समाज, व्यवस्था, शिक्षा, संस्कार, संविधान, संस्कृति, सभ्यता, जीव-वनस्पति, पदार्थ, ग्रह गोल, सहअस्तित्व इन सबका प्रयोजन सम्मत विश्लेषण, विश्लेषण सम्मत प्रयोजनों को जानना-मानना विद्वता की अभिव्यक्ति है। संप्रेषित करना, पहचानना- निर्वाह करना प्रज्ञा है।

3. कीर्ति 4. वस्तु

कीर्ति :- वर्तमान में विकास और जागृति के संदर्भ में की गई श्रेष्ठता व सुलभता की प्रामाणिक प्रस्तुति।

वस्तु :- (1) सहअस्तित्व सहज प्रकाशन, संप्रेषणा, अभिव्यक्ति। (2) वास्तविकता को प्रमाणित करने वाली इकाई और सत्ता।

मानव में कीर्ति जीवन तृप्ति का प्रमाण है। वस्तु, अनुभव व प्रमाणों को तर्क संगत (प्रयोजन सहित विश्लेषण युक्त) प्रणाली से संबद्ध करना और स्पष्ट करना है।

जीवन जागृति, अनुभव मूलक अभिव्यक्ति सहज प्रमाण है। वस्तु (मूलतः विवेक सम्मत विज्ञान) की अपने में सुलभता, मानव कुल के लिए एक आवश्यकता है। यह अनुभव मूलक विधि से सार्थक होना समझ में आया है। आज की स्थिति में विज्ञान, ह्रास-नियम, यन्त्र प्रमाण के रूप में है जबकि उसे विकास नियम और व्यवहार प्रमाण के रूप में होना चाहिए। जो अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतनपूर्वक ही हमें परस्परता में स्थित प्रत्येक एक दूसरे के लिए पूरक होना विकास और जागृति नियम के रूप में समझ में आया है।

विकास नियम अस्तित्व में पूरकता के रूप में है। पूरकता विधि से ही सभी प्रकार के आवेशों का शान्त होना देखा जाता है। इसका साक्ष्य यही है कि यह धरती अपने आप में समृद्ध है। स्वभाव गति में है। ऐसी समृद्ध धरती पर मानव का अवतरण और परम्परा है। इस धरती के समृद्ध होने का तात्पर्य है - इस धरती में जितने भी पदार्थ हैं उनका स्वभाव गति में कार्यरत होना जो भौतिक वस्तुओं के रूप में भी वर्तमान हैं। जिसके फलस्वरूप योग व संयोग होना रासायनिक रचना

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