सूत्र, परिवार-मूलक विधि से सूत्रित होकर ग्राम-स्वराज्य में सार्वभौम स्वराज्य व्यवस्था का छोटा रूप प्रमाणित होता है। यही “परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था” होने का सूत्र और संभावना है।
अभी तक इस पृथ्वी पर जितनी भी राजगद्दियाँ और धर्म गद्दियाँ हैं वे रहस्य से मुक्त नहीं हो पायी हैं। जिस मानसिकता से ये गद्दियाँ स्थापित हुई हैं उस मानसिकता के चलते रहस्य से मुक्त नहीं हो सकती और इससे शक्ति केन्द्रित शासनवाद में परिवर्तन नहीं हो पाता। जबकि सहअस्तित्व में पूरक विधि और सार्वभौम व्यवस्था (अथवा समग्र व्यवस्था) नित्य वर्तमान है। दुसरे शब्दों में सहअस्तित्व ही पूरक विधि से समग्र व्यवस्था के रूप में वर्तमान है। मानव ने ही अपनी कर्म स्वतंत्रता व कल्पनाशीलता वश अस्तित्व सहज व्यवस्था को अनसुनी, अनदेखी करते हुए सभी प्रकार से प्रताड़ित होने का ताना -बाना बना लिया है, जैसे - शासन करने का हजारों वर्षों का प्रयास सदा पाश्विक रहा।
इसका प्रमाण है कि शासन कार्य परस्पर बैर बढ़ते ही रहा। परिवर्तन की आवश्यकता हर परिवर्तन के अनंतर भी बनी रही। युद्ध के अनंतर युद्ध की तैयारियाँ, आश्वासनों के अनंतर आश्वासन की तैयारियाँ, मतभेदों के अनंतर मतभेद, हर समझौते के अनंतर उसी में प्रश्न चिन्ह, इसी के साथ संग्रह के अनंतर पुनःसंग्रह, सुविधा के अन्तर पुनः सुविधा तथा भोग के अनंतर पुनः भोग इसके प्रश्न चिन्ह बन जाते हैं। यह अव्यस्था का द्योतक है।
निश्चय व धैर्य, सहअस्तित्व समाधान, अभय, समृद्धि, व्यवस्था में भागीदारी, मानव मूल्य, समाज मूल्यों के निर्वाह यह सब मानव में सहजता वश सुलभ होता है। परस्पर संबंधों को पहचानने के रूप में सहअस्तित्व प्रमाणित होता है। सहअस्तित्व के आधार पर विश्वास होना जागृत जीवन सहज अभिव्यक्ति है। स्वयं का समग्र व्यवस्था में भागीदारी समाधान के रूप में होना सहअस्तित्व व विश्वास के योगफल में सम्पन्न होता है।
प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने योग्य है इसलिए स्वराज्य व्यवस्था का गति रूप न्याय सुलभता, उत्पादन सुलभता, विनियम सुलभता है। इस प्रकार मानव के लिए अपने निश्चय और धैर्य को वर्तमान में प्रमाणित करने का स्वरूप आवश्यकता और अवसर स्पष्ट है।