निश्चय मानसिक रूप में समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व के प्रति विश्वास और अनुभव मूलक विधि से स्वीकार है। जो निष्ठा के रूप में व्यक्त होता है। उसके कार्य रूप को ऊपर (अर्थात् शरीर और जीवन का संयुक्त रूप) स्पष्ट किया जा चुका है। निश्चय और धैर्य जीवन रूप में जागृति ही है। जागृति का तात्पर्य जानना-मानना, पहचानना व निर्वाह करना ही है। इस कार्य का जीवन गत स्वरूप जागृति है।
अस्तित्व में धैर्य और निश्चय अपने में अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान और विकास की निश्चयता के रूप में समझा जाता है। इस प्रकार धैर्य व निश्चय सहअस्तित्व सहज, विकास सहज, जीवन सहज व जीवन जागृति सहज होना अध्ययनगम्य है। व्यवस्था व व्यवस्था में भागीदारी के लिए यह विश्वास आवश्यक है।
प्रत्येक मानव को परिवार और परिवार कार्यों की निश्चयता की अपेक्षा व आवश्यकता है। परिवार स्वयं में अखंड समाज एवं सार्वभौम व्यवस्था का बीज और स्रोत रूप है।
व्यवस्था का प्रमाण प्रत्येक व्यक्ति में वर्तमान में विश्वास है। उसकी अभिव्यक्ति समाज है। समाज गति संबंधों व मूल्यों को निर्वाह करने के मूल में देखने को मिलती है। यह प्रत्येक मानव की सहज अभीप्सा है क्योंकि यह जीवन जागृति गत क्रिया है। जीवन में ही आशा, आकाँक्षा और इच्छाएँ प्रसवित व व्यवहार में फलित होना पाई जाती है। परिवार की निश्चयता संबंधों में निहित है और उसके निर्वाह में धैर्य प्रमाणित होता है। यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वागतीय है।
7. शांति 8. दया
शांति :- (1) इच्छा एवं विचार की निर्विरोधिता (2) समाधान पूर्ण विचार की प्रतिक्रिया।
दया :- पात्रता के अनुरूप वस्तु, योग्यता प्रदायी क्षमता।
शांति का स्वरूप अस्तित्व में सत्ता में संपृक्त प्रकृति स्वभाव गति के अर्थ में पहचाना जाता है। इसके नामकरण के मूल में “सहअस्तित्व” है। इससे यह पता चलता है कि सहअस्तित्व में ही शान्ति है। जीवनगत रूप में शांति चित्त और वृत्ति के बीच संगीत का स्वरूप है। यह निरंतर उत्साह, उल्लास, न्याय व समाधान का स्रोत है। व्यवस्था में यही जागृत जीवन पद का वैभव मानव को, परिवार को उत्सवित बनाए रखता है।